*जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )*
*विषय .....सिखावन*
(विधा .....दोहा)
मानव जीवन फूल है, प्रेम तत्व मधु जान।
सदाचार पथ मूल है, नेक कर्म शुभ मान॥
कपटी क्रूर कुचाल से,रहना चेत सुजान।
अदना विपदा काल में, कट जावेगा कान॥
सुजन संग शुभ है कहा, दुर्जन संग अमान।
सज्जन वेद पुराण ने, सत्य किया बखान॥
भाषा चुनकर बोलिये, सार्थक बोध विचार।
अशुभ वचन अच्छा नहीं,भाव नीरस विकार॥
मधुर बोल जग जीत लो, मानवता शुचि सार।
कटुक वचन सुन शूल है, नीच नीरस प्रचार॥
पढ़े लिखे जन को सदा, मिले जगत में मान।
बिना ज्ञान शोभा नहीं, करो निरक्षर ध्यान॥
जग में नारी जाति का, मत करना अपमान।
जननी के आशीष से, बने बड़ी पहचान॥
मानुष अवगुण एक ही, सौ गुण करता नाश।
जस पतझड़ में आग से, वन का हुआ विनाश॥
भारी फसल असत्य की, करती मालामाल।
फिर मानव को मूल से, कर जाती कंगाल॥
वीर जवान बढ़े चलो, शुभ समय की पुकार।
सुयश गौरव बना रहे, सादर नमन हजार॥
जननी वसुधा वन्दिता, दोनों एक समान।
देती ये शुभ कामना, उभय त्याग की खान॥
नीच मक्कार लालची, शोषण लोभ विचार।
विषधर जान समाज से, तज इनसे व्यवहार॥
विद्या धन अनमोल है, उचित करो उपयोग।
इच्छित को दो शौक से, नचेत जी क्षय रोग॥
नशा नाश का मूल है,धन इज्जत बर्बाद।
आसक्त बन्धु छोड़ दो,आश्रित हों आबाद।
उपदेशक हैं लाख में,नहीं मानता एक।
कथनी करनी एक हो,समझो सधा विवेक॥
खरा वही इंसान है,नीति वचन ले मान।
सदा कृतज्ञ रहे अगर,समझो सेवा ज्ञान॥
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