जिला :- महासमुन्द
विधा :- कविता
रस :- करूण रस
अलंकार :- उत्प्रेक्षा अलंकार
शीर्षक :- मजबूर मजदूर
नित निकल पड़ते हैं काम पर,
ज्यों नित उगता है दिनकर,
लौट आते हैं शाम ढ़ले बसेरों में,
मानो लौट रहे खग दल थक कर।
थक हार कर कमाई से गांव के,
बेबस हुए हम इस कदर,
मानो कस्तुरी गंध जंगल - जंगल,
सुख - चैन की तलाश में हम आए शहर।
कमाई की थी बहुत मगर,
मानो लगी हो खुशियों को नजर,
चली बयार रोग की ऐसे,
हर प्रयास होने लगे बेअसर।
ना रेल, ना बस, ना और कोई साधन मिला,
बैठकर जिसपर जा सकें लौटकर,
सोंच लिया, ठान लिया मन में,
नापेंगे गांव तक का रास्ता चलकर।
निकले जेठ की दुपहरी में,
घर लौट जाने की सोंचकर,
चलकर तपन से, यूँ फोड़े हुए पैर पर,
मानो फुली पुड़ी तेल में छनकर।
ना कर पा रहे पसीने व आँसू में अंतर,
भीगा बदन हुआ तर - बतर,
गिर जाते हैं अक्सर राहों में,
चलकर धूप में चकराकर।
जाने कितने ही दिन प्यासे चले,
मानों ऊंट जो ना पीये पानी हफ्तों तक,
ना बैठे फिर भी, ना सुस्ताए छांव में,
ना रूके चलते कदम थककर।
धीरे - धीरे दिखने लगी,
पद चिन्हों की लाली सड़क पर,
ज्यों चल रही नव वधू,
लगा लाली पैरों पर।
पांव जीत गया, मन हारा,
गांव में पहुँच यह देखकर,
ना मिल सके घर वालों से हफ्तों,
ग्राम्य सीमा में आकर।
पड़े पिंजरे में रह गए,
मानो जानवरों से अटा चिड़ियाघर,
बिखर गया मनोबल मजदूर का,
जमाने की मार सह कर।
रोता फूट - फूट कर वह ऐसे,
मानों आँखों से बहता सागर,
मजबूर मजदूर है इतना आज,
खुद के बसेरे में आकर।
व्याख्या:- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने मजदूर वर्ग की वेदना प्रकट करते हुए कह है कि मजदूर जो सूरज के जैसे सुबह उठकर शाम चिड़ियों की टोली के समान घर आता है, पैसे की लालच में आकर शहर चला गया। लेकिन मानो उसकी खुशियों को नजर लग गई हो, महामारी के कारण उसे घर का रास्ता देखना पड़ा। उसमें भी आवागमन के साधन न मिलने पर चल कर रास्ता नापना पड़ा, उसकी व्यथा यहीं नहीं थमी, घर पहुँचकर भी वह अपने परिवार के लोगों से मिल नहीं पाया।
बहुत सुंदर
ReplyDeleteBahut hi sundar vinod sir
ReplyDeleteWow gjb
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