Saturday, May 30, 2020

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर से कृष्ण कुमार ध्रुव "सृजन"की रचना- दिहाड़ी

 कृष्ण कुमार ध्रुव "सृजन"
जिला:- सूरजपुर (छ0 ग0)
शीर्षक:- *दिहाड़ी-मजदूर*
विधा:- कविता
रस- *करूण रस* 
अलंकार प्रयोग:- *उत्प्रेक्षा-अलंकार*


मजदूर आंजे आंसू नयन,
कुनबा संग चले लीन।
मानहुँ सुर ताल विमल,
जैसे जल उछरत मीन।

जग में मारे भूख के,
तन फटने उसका लगा।
मानो समय के मार से,
रोता हुवा जमीर जगा।

कहती हुई यो वनिता के,
चक्षु अश्रु भर गये।
तुषार बूंदों से पूर्ण मानो,
हो गए पुष्कर नये।

देखत जिंदगी के अथाह विपदा,
कलपत सूत तनुजा भारी।
मनहुँ  मन विचार करत,
किस्मत दोष देत नर नारी।

कंधों पर है बोझ बढ़ा,
पसीनों से भूमि को सींचा।
ज्यों धूसर पीठ पर सील लिए,
जीवन रूपी चक्र को खींचा।

***********************

व्याख्या:- मजदूरों और उनके परिवारों की दयनीय स्थिति के बारे में वर्णन है, मजदूर अपने परिवार के साथ दो वक्त की रोजी रोटी के लिए कहाँ कहाँ नई भटकते।


कृष्ण कुमार ध्रुव "सृजन"
जिला:- सूरजपुर

4 comments:

  1. उत्कृष्ट, ध्रुव सर

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  2. वास्तविक जीवन पर आधारित शानदार रचना सर जी

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  3. bahut sundar kavy lekhan sir ji

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