शीर्षक- तलाश
-जिला-कांकेर
विषय-स्वतंत्र सृजन
विधा-छंद मुक्त
*तलाश*
मैं तलाशता हूँ जिंदगी को
मगर मिलती नहीं साँसों में,
लोग जिसे जिंदगी कहते है,
पत्थरों के शहर में नाखुदा बसते है।
मैं तलाशता हूँ खुशियों को,
मगर मिलती नहीं खनकती हँसी में।
खोखली हँसी के बीच उदासी पलती है।
मैं खोजता हूँ सुख,शांति को,
मगर मिलती नहीं एहसासों में।
सुख -शांति के बीच मार-काट ,हिंसा पलती है।
मैं तलाशता हूँ प्रेम,धैर्य एवं संयम को,
मगर मिलती नहीं किसी के ह्रदय में,
प्यार पनपता दिखता नहीं,
केवल दिखावा की दुनियाँ में
बहरूपिया रहते है।
मैं तलाशता हूँ जिंदगी को,
मगर मिलती नहीं साँसों में।
व्याख्या-आज के दौर में उहापोह भरी जिंदगी के चलते मनुष्य हमेशा जीवन के मूलतत्वों को खोजता रहता है।संवेदन हीनता के चलते प्रेम,,धैर्य,सुख-शांति सब खो सा गया है।मनुष्य दिखावा की दुनियाँ में रूप बदलता रहता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)
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