जिला:- महासमुन्द
शीर्षक:- "जाने क्या जादू है?"
विधा:- कविता
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जाने क्या जादू है?
मुखड़े में तेरी माँ।
पलकें जब भी मीचता हूँ,
तेरी चाँद सी झलक मिल जाती है।
जाने क्या जादू है?
हाथों में तेरी माँ ।
स्वाद छप्पन भोग से होते हैं,
तू जो भी बनाती है।
जाने क्या जादू है?
बोली में तेरी माँ ।
मैं खुद में ही खो जाता हूँ,
तू जो भी गाती है।
जाने क्या जादू है?
हाथों में तेरी माँ ।
सुकून स्वर्ग सा मिलता है,
जो तू सर सहलाती है।
जाने क्या जादू है?
स्नेह में तेरी माँ।
मैं गोते लगाता हूँ,
जो तू सुधा ममता की बहाती है।
टूट सा जाता हूँ खुद में
अश्रु जो तू बहाती है।
सूरजमुखी सी खिल उठती है,
जब तू मुस्काती है।
जाने क्या जादू है?
मुस्कान में तेरी माँ ।
सारे दुख बिसरा देता हूँ,
जो तू अल्हड़ हो मुस्काती है।
व्याख्या:-
उपरोक्त रचना में माँ और एक नादान बच्चे के बीच के वात्सल्य को रचनाकार ने पिरोने का प्रयास करते हुए कहता है कि हे माँ, तेरे मुखड़े में, हाथों मे, बोली में, स्नेह में और मुस्कान में वो जादू है कि नादान बालक सारा दुख- दर्द भूलकर बस खो सा जाता है।
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