पता - पेंडरवानी ,बालोद ,छ. ग.
शीर्षक -रिश्तों की खातिर
सम्पर्क -9098518976
रिश्तों की ख़ातिर
----------------------------------------
अपना दर्द खुद से कह लेता है,
रिश्तों की खातिर ,
न जाने क्या- क्या ? सह लेता है ,
रिश्तों की खातिर ,
बुनियाद खड़ा करता है रोज -
मर - मर कर ,
वो झोपड़ी में रह लेता है ,
रिश्तों की खातिर ,
पढ़ा - लिखा काबिल बनाया जो ,
साथ हँसकर, अकेले रो लेता है,
रिश्तों की खातिर ,
बुढ़ापे का सहारा बनेगा ,
सोचकर न कोई ख्वाहिश की ,
वो आज भी भूखे सो लेता है ,
रिश्तों की खातिर ,
उसकी सोच पुरानी ही सही ,
पर तेरे लिए वाजिब था ,
आज नौकर का तमगा ढो लेता है ,
रिश्तों की खातिर ,
जिनके रहमो-करम से तू आज इतराता है ,
वो जूठे बर्तन तक धो लेता है,
रिश्तो की खातिर ,
तेरी छोटी -छोटी ख्वाहिशों पर जान छिड़कता था ,
वो झिड़कियां सुन चुप रहता है ,
रिश्तों की ख़ातिर ,
बचपन से अब तक अपने आश्रय की छांव में रखा ,
वो हरपल दुखो का धूप सहता है ,
रिश्तों की खातिर ,
जो कभी तेरे आंखों में आँसू न आने दिया ,
वो अपनो में पराया सा रहता है ,
रिश्तों की खातिर ,
वो कभी बतलाता नही कि कितना प्यार है तुमसे ,
चुप रह के भी , समझ लो कहता है ,
रिश्तों की खातिर ,
तेरी खुशियों का एहसास हरपल रहता है ,
वो अपना सबकुछ लुटा देता है ,
रिश्तों की खातिर ,
वो पिता है जिसे बयां न करने आया प्यार अपना ,
पर खुद को मिटा देता है ,
रिश्तों की खातिर ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
No comments:
Post a Comment