सुभाष नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
शीर्षक -धधकती धरती
छत्तीसगढ़ के माटी के स्वर तेहा नहीं सुनेंहस
सोन के माटी हरे,मोर दाई तेहा
नहीं देखेहस।।
ए माटी में पले बढ़े हन,किसन कन्हैया माटी खवैया नहीं देखेहस?
दिन दुखियो के पीरा हरैया ,ए धरती हमर भगवान हरे
श्रमवीर किसनहा हमर बर, भगवान हरे।।
भिलाई के इस्पात के कारखाना,पिघलत लोहा देश-विदेश में रेलइस्पात बनावत हे।।
राजहरा के ताल थिरकत,इस्पात के जवानी नहीं देखेंहस
भूखे पेट रहिके,सबके भरण-पोषण करइया दाई।।
अपन ही छाती में कब तक कितना सहन करही
महाकाल आके कितना जहर भरही।।
पुंजीपति मन आके मोर किसनहा ला दबाथे
मोर बेटा पेज ला खाके,सब ला खवाथे।।
जातिवाद के नशा में,हमर देश लिलावत हें
खून चुसत हे पुंजीपति मन ह,हड्डी ल मरोड़त हे।
अब संभल जा मोर लइका मन,नवा बिहान लाहू गा।।
अव नवा सुरज बनके धरती ला बचाहूं गा।।
सीमा अष्टमी साहू
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