Thursday, May 21, 2020

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा से सूर्य प्रकाश पाटिल की रचना- भूख और तृप्ति

रचनाकार- सूर्य प्रकाश पाटिल
जिला- बेमेतरा (छ. ग.)
शीर्षक- भूख और तृप्ति
विधा -कविता


आज सुबह मै जा रहा था,
अपने ऑफिस गाड़ी से।
सामने जा रही वाहन पर,
नज़र पड़ी तो हटी नहीं।
था वो कोई मालवाहक,
माल उस पर था लादा हुआ।
उन सामानों के ऊपर,
इंसान था लदा हुआ।
और इंसानों के ऊपर,
इंसान थे लदे हुए।
इंसान में सभी लोग थे,
नर नारी और बच्चे।
चेहरे से लग रहे थे सभी,
थके भूके और प्यासे।
तभी अचानक मेरी नज़र,
उन कुछ लटकती पैरों पर पड़ी।
जो छालों और घावों से,
थी भरी हुई।
और रिस रहा था,
उसमे से मवाद भारी।
ना जाने कितने कोस चले होंगे,
कितनी रातें भूखे प्यासे सोये होंगे।
क्या जाने दिन रात चले हो,
तब जाकर यह मालवाहक नसीब हुआ हो।
यही सब मै सोच रहा था,
मन विचार चल रहा था।
एक बच्चे ने हाथ दिखाई,
तभी अचानक मेरी अोर।
मै उसे देखा तो,
देखता ही रहा उसकी आेर।
मेरा बेटा, मेरा बेटा,....
उस मजदूर महिला की गोद में नज़र आया।
फिर दूसरे बच्चे को देखा,
वो भीअपने सा दिखा।
फिर सभी बच्चों में मुझे,
अपने बच्चों का चेहरा दिखा।
होंठ सबके चिपक गए थे,
मारे भूख और प्यास के।
जाने कब के प्यासे थे वे,
भोजन किए थे किस रात से।
तभी मैंने स्पीड बड़ाकर,
गाड़ी के क्लीनर से बात किया।
और आगे गाड़ी रोकने की,
उससे मनुहार किया।
आगे खुली मिली एक दुकान,
मैंने ले ली सारी बिस्किट और पानी पाउच।
गाड़ी से उतरा एक मजदूर,
सामान सहर्ष स्वीकार किया।
भूखे प्यासे सभी थे लेकिन,
बच्चों का उन्होंने पहले ख़्याल रखा।
तृप्त हो रहे थे सभी मजदूर,
हम भी(मै और दुकानदार) तृप्त हो रहे थे।
ऐसी तृप्ति नहीं मिलेगी,
जहां मिली है तृप्ति दोनों तरफ़....




भावार्थ- मजदूर वर्ग रोज़ कमाने और खाने वाला होता हैं अभी lockdown के समय उनके सामने काम की समस्या आ गई उसी के साथ पैसे खाने की कमी हो गई। वे अपने घरों को लौटने के लिए मजबुर हो गए साधन व पैसे के अभाव में पैदल निकल पड़े। और कहां कहां से मजदूर नहीं आए। आश्चर्य होता हैं!!! और क्या क्या कष्ट नहीं सहे शब्दों में कह पाना सम्भव नहीं............

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