*ब्लॉक:- प्रेमनगर, जिला:- सूरजपुर, छत्तीसगढ़*
*विधा:- कविता*
*विषय:- मानवीकरण अलंकार*
*शीर्षक:-बन ठन के मेघ आये।*
बड़े बन ठन सज संवर के मेघ आये।
धरा तृप्त करने अम्बर से जल बरसाये।
हृदय तल प्रफुल्लित हो खिला है तन।
हरित दुपट्टे ओढ़े हर्षित हुवा है मन।
वृक्षों में नई कोपलें लग गई।
बागों में बेल लताएं भी खिल गई।
लाल, हरा, पीला रंग बिरंग रूप लिए हैं धरा।
पर्वत नदी पहाड़ झरनों से है भरा।
कभी गरम कभी ठंडा होकर जलाती है।
देखता रहता हूँ क्या क्या मंजर दिखाती है।
चांद जैसे मुखड़े पर सूरज बिंदिया लिए बैठी है।
अपने इस आँचल में चांद तारे लिए बैठी है।
झूमते हुए इन पेड़ों को देखो जो पुरवाई देते है।
तपती धूप में खुद जलकर दूसरों को छाया देते है।
*कृष्ण कुमार ध्रुव " सृजन "*
आप तो लाजवाब लिखते हैं
ReplyDeleteहौसला अफजाई के लिए आपका बहुत बहुत सुक्रिया सादर नमन💐💐💐🙏🙏
Deleteबहुत अच्छा
ReplyDeleteभैया जी बहुत बहुत सुक्रिया सादर प्रणाम🙏🙏💐💐💐
DeleteVery nice
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद💐💐💐💐🙏🙏
Deleteअच्छा है
ReplyDeleteआपका हार्दिक सुक्रिया💐💐💐💐💐
Delete👌👌🌺🌺🌺
ReplyDeleteThank you......💐💐💐💐
Deleteआदरणीय महोदय जी आपका बहुत बहुत सुक्रिया🙏💐💐💐💐💐
Deleteबहुत ही अच्छी रचना...
ReplyDeleteसम्माननीय भाई साहब बहुत बहुत सुक्रिया सादर नमन💐💐💐💐💐💐
Deleteबहुत खुब भाई जी आपके कलम मे ओ ताकत है जो दिल से समझ गये तो अपना सृजन जरुर कर सकता है,बहुत बहुत बधाई,बहुत बहुत शुभकामनाएं
ReplyDeleteआपके इस हौसला आफजाई के लिए दिली हार्दिक सुक्रिया सादर प्रणाम💐💐💐💐💐💐🙏🙏🙏🙏
Deleteआपका हार्दिक सुक्रिया महोदय जी💐💐💐💐
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रकृति का मनोहारी परिदृश्य रेखांकित है आपके पंक्ति में ।बधाई हो आपको
ReplyDeleteआप यूं ही सदा कविताएं लिखते रहें हार्दिक शुभकामनाएं महोदय
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