रचनाकार - प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
शीर्षक - "तरु बिनु कैसी धरती
काया "
विधा -- मानवीकरण अलंकार
(सार छंद)
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।।१।।
देखो धरती माता ने सब ,
मानव सौप दिया है।
मतलब की इस दुनियां ने ही ,
सब कुछ लूट लिया है ।।
तन से तरुवर मंजुल उपवन,
हमको भूमि दिया है ।
अच्छादित वन सुरभित समीर,
नर उपभोग किया है।।
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।।२।।
बिन तरु कानन उपवन धरती,
निःशब्द आज पडी़ है ।
दुविधा में है मानव सारा,
वन तो पतन खडी़ है ।
जंगल प्राणी सब जीव जगत,
कैसी विपत घडी़ है।
स्वार्थी नर के कारण देखो,
जंगल शूल अडी़ है।।
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।।३।।
तरु बिनु कैसी धरती काया,
देखो ये तपते हैं ।
दिन दिन ज्वर का प्रभाव कैसे,
देखो ये जलते हैं ।
गरमी ज्वर की धारा तन मन ,
धरती में चलते हैं ।
पौधों पर ही तो घातें हम,
मानव क्यों करते हैं ।।
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।।४।।
तन धरती का तप्त हुई है ,
ठंडकता खोई है ।
मन धरती का तप्त हुई है ,
करुणा से रोई है ।
पीडा़ है कितने रातों से ,
निज दुख में खोई है ।
बीमारी कैसी तन मन की ,
निज दुख में रोई है ।।
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व्याख्या :---
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प्रस्तुत छंद में
धरती का मानवीकरण कर वृक्षों की लगातार हो रही कटाई का पृथ्वी पर हो रहे प्रभावों का बडे़ ही सारगर्भीत रुप में सृजन का एक सार्थक प्रयास किया गया है।
प्रकृति ने हमें जीवित रहने के सारी चीजें दी है , परन्तु मानव ने स्वार्थ की गर्त में डूब कर प्रकृति के संतुलन को धराशायी कर दिया तथा आज जितनी भी आपदाऐं हो रही है संभवता इसी का परिणाम है ।
अतः हमें अधिकाधिक वन संरक्षण और वृक्षारोपण किया जाना चाहिए , जिससे प्रकृति का संतुलन समस्त जीव जगत के हित में विकसित हो सके ।।
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