रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
विधा :- कविता
भाव :- करूणा / शोक
" दूध का कर्ज "
डांट सुन बहु - बेटों की,
बूढ़ी आँखे फिर से बह चली।
सालों पहले की बातें फिर,
आँखों में उमड़ चली।
नटखट नासमझ था,
प्रश्न बेतुके बार - बार पूछता था।
माँ मासूम से हर प्रश्नों का,
हर बार जवाब देती थी।
आज बस इतना पूछा माँ ने,
"वो जो दोपहर में आए थे,
बेटा आखिर वो कौन थे?"
तुनक तुरंत ही बहु ने,
फटकार उनको लगाई।
बहु की बद्तमिजी पर बेटे ने,
ना कोई प्रतिक्रिया दिखाई।
पलट माँ को ही,
सुना दी खरी - खोटी।
टूट गया दिल माँ का,
बेटे ने कर दी बोटी- बोटी।
कहा :- "माँ इतना किचकिच क्यों करती हो?
खुद को सीआईडी समझ क्यों?
इतना पूछ - ताछ करती हो।"
रहो चुपचाप कोने में,
वरना वृद्धाश्रम छोड़ आऊंगा।
की जो ज्यादा चपड़ - चपड़,
सारे रिश्ते तोड़ आऊंगा।
सुन कर ये लफ्ज बेटे के,
बूढ़ी लफ़्ज माँ की सी से गए।
वो बरसों पहले का लाड - दुलार,
माँ को याद आ गए।
होता देख बदमाश बेटे को,
पिता ने फरमान दिया था।
ना भेजुँगी बोर्डिंग बेटे को,
माँ ने मन में ठान लिया था।
बात बेटे को ना भेजने की,
बमुश्किल बाबूजी को समझाई थी।
समझाऊंगी मैं खुद इसे कह,
जिसे बोर्डिंग जाने से बचाई थी।
खड़ा होना था जिसे,
माँ के बुढ़ापे की लाठी बन।
बात बहु की मानकर आज,
वृद्धाश्रम भेजने को गया तन।
नौ महिने की कोख और,
माँ के वर्षों के तप का,
आज अच्छा दिन दिखाया था।
छोड़ ही आया आज उसे वह,
शायद ऐसे ही,
हाँ ऐसे ही उसने आज
माँ के दूध का कर्ज चुकाया था।
व्याख्या:- इन पंक्तियों में रचनाकार ने एक बूढ़ी माँ की वेदना का चित्रण किया है, जिसमें एक माँ अपने नन्हें बच्चों की हर संभव देखभाल करती है, उसके हर सवालों का जवाब देती है। और जब वहीं माँ अपने वृद्धावस्था में होती है तो उनकी बातें किचकिच लगती है। एक बेटा अपनी माँ के दूध का कर्ज उसे वृद्धाश्रम भेज कर चुकाता है।
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