स्थान-खरसिया
जिला-रायगढ़
विधा-कविता
शीर्षक -बिगड़ रहा है पर्यावरण
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बिगड़ रहा है पर्यावरण
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बिगड़ रहा है पर्यावरण,
पेड़ों का नित हो रहा हरण।
मानव कब जागेगा तू,
इसी से तेरा जीवन मरण।
भूमि का भी हो रहा क्षरण,
रासायनिक खादों का पड़ा चरण।
खेती फसलों में है जहर घुला,
कैसे होगा आगे उदर भरण।।
कहाँ जाएँ, हम किसके शरण,
प्रदूषण का है लगा ग्रहण।
जल जमीं हवा ध्वनि पर,
हो रहा है रोज आक्रमण।।
बढ़ रहा जंगल मेंऔद्योगीकरण,
कर रहे कंक्रीट वनों का वरण।
प्रदूषित खान-पान है सब नकली,
क्यों कर रहे हम अंधानुकरण
।।
कब होगा यहाँ जनजागरण,
कब सुधरेगा मानव का आचरण।
मोटर गाड़ी चिमनी धूल धुआँ से
आज बिगड़ रहा है पर्यावरण।।
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गुलाब सिंह कंवर "गुलाब"
व्याख्या-बिगड़ते पर्यावरण पर कविता के माध्यम से सचेत किया गया है । नित जंगल की कटाई, बढ़ते औद्योगीकरण, जल,वायु, भूमि,ध्वनि, प्रदूषण के बढ़ते कुप्रभाव को इंगित किया गया है। इस सम्बन्ध में मानव में जागृति हेतु आह्वान किया गया है।
Nice
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