शीर्षक- हूँकार
विषय-रौद्र रस
विधा-छंद मुक्त
जिला-कांकेर
अरि वचन सुन क्रूर काल सा रूप बना,
हूँकार भर रणस्थल पहूँचा क्रोध से सना।
देख शत्रु दल के वार तन कांपने लगा,
लगा सागर से रुधिर वह उगलने लगा।
तन थर-थर कंपित हुआ जस बहे बयार हुआ,
कठिन दौर था लगा सर पर मौत सवार हुआ।
जीवन को दांव पर लगा सैन्य पथ की ओर बढ़ा,
लगता था जैसे साक्षात मौत है खड़ा।
व्याख्या-शत्रु पक्ष के वचन सुन वीर पुरुष क्रोध से हूँकार भरता हुआ रण- स्थल पहूँचा।क्रोध से कांपता जीवन को दांव पर लगा टूट पड़ा,ऐसे लगा जैसे साक्षात मौत खड़ा हो।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर(,छ. ग.)
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