ग्राम बुलाँकी
जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा कविता
शीर्षक "तृप्ति की तलाश"
प्रयोजन - तृप्ति का अर्थ है, संतुष्टि होना या सुखी होना ,संसार में मनुष्य संतुष्टि होकर तृप्ति के साथ सुख पूर्वक जीने के लिए अवतरित हुआ है ।तृप्ति के बिना उसका जीवन अधूरा है ।वह हर पल तृप्ति की तलाश में ही व्यवहार कार्य करता हुआ जिंदगी जीने का प्रयास कर रहा है। इसी संदर्भ में यह सुख रुपी भावात्मक कविता व्यक्त की गई है ,क्योंकि हर इंसान सुख की चाहत के साथ जिंदगी जीना चाहता है ।तृप्त होकर जीना चाहता है।
"तृप्ति की तलाश"
तृप्ति तुम कहाँं हो,
तू कहाँं है समाई,
तेरे बिना जीवन अधूरा,
मैं हूं व्याकुलाई ।
हर पल तुझे ढूंढ रही हूंँ,
आज तक तू मिल न पाई,
तेरे बिना मन असंतुष्टि है ,
तू कहां है छिपाई।
तृप्ति........
अध्यात्मा में ढूंढी,
विलासिता में ढूंढी,
मुझे तृप्ति नहीं मिल पाई,
मैं व्यर्थ में जिंदगी गवाँई ।
तृप्ति.........
सुबह से लेकर शाम तक,
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
तुझे हर पल तलाशने आई,
तुझे पाने के लिए तरसाई।
तृप्ति..........
तुझे कार्य में ढूंढी,
व्यवहार में ढूंढी,
ढूंढ ही तुझे बिहार में,
तू कहीं नहीं मिल पाई।
तृप्ति.........
अब अर्थी उठने वाली है,
मैं स्वयं का अर्थ समझ नहीं पाई,
बिना लक्ष्य के तुझे ढूंढने,
मैं इस भवसागर में आई।
तृप्ति तुम कहाँ........
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संक्षिप्त व्याख्या-
इस कविता में कवित्री तृप्ति के बारे में भाव व्यक्त किया है, कि इस संसार में हर मनुष्य केवल और केवल सुख पाने की चाहत मेरी जिंदगी में व्यवहार कार्य करते हुए सुख की तलाश कर रहा है वह हर पल हरछठ जो भी क्रिया घटना के रूप में करता है। केवल तृप्ति के लिए करता है। मनुष्य जिंदगी भर सुख की तलाश करता है ।लेकिन तृप्ति नहीं मिल पा रहा है।
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