Thursday, May 7, 2020

महाराष्ट्र से संजय वासनिक “ वासु” की रचना- हे बुद्ध

कवि:- संजय वासनिक 
शीर्षक:- * हे बुद्ध * 
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र 
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
———————————

हे बुद्ध

ना तुम ईश्वर  थे
ना ईश्वर के पुत्र 
और 
ना ही किसी ईश्वर द्वारा
इस धरती पर भेजे गये
कोई अलौकीक दुत..
तुम तो थे एक इंसान ...

जिसने इंसान को इंसानसे
जोडे रखने का दिया मूलमंत्र
बताया था तुमने एक नया रास्ता...
सत्यता से सत्य जिवन जीने का, 
देकर  मानवतां का संदेश ...
सिखाया था कैसे बनाया जाये, 
मानव से मानवतां  का रिश्ता...

ना तुमने किसी पर प्रेम किया, 
ना ही किसी का तिरस्कार....
तुम्हारे मन मे हर मानव के, 
प्रति भरी है करुणा अपार ....

ना तुमने किसीकी की तारीफ
ना ही कीया किसीका अपमान,
पर तुमने तठस्थ भाव से कर 
चिकीत्सा, किया मन का उपचार ...

ना ही किसीको दिया शाप और उ:शाप 
ना ही तुमने किसीको दिया आशिर्वाद...
पर सिखाया चलना मानवतां के पथपर मानव को बताया  मानवतावाद ...

माने तो तुम भिक्षापर उपजिवीका 
करने वाले चरित भिक्षुक....
ना माने तो एक साधारण इंसान ...
लेकीन तुम हो प्रकांड विद्वान 
जिसके अंदर भरा है 
अद्वितीय तत्वज्ञान...

ना तुम अल्प हो, ना ही अति
अल्प और अति के मध्य
स्तंभोपर बने पुलपर ...
एक साधारण इंसान 
सहज चलने वाले 
मध्यम मार्ग पर ....

तुम सूक्ष्म  अणु  हो या 
हो  आकाश अनंत..
जिसका ना कोई 
आदि ना कोई अंत ..
तुम हो ज्ञान के गहरे  संमंदर 
जिसका ना कोई तल 
ना कोई अंदाज..

इस नादान के समझसे परे हो 
की कौन हो तुम और क्या हो तुम ..
तुम हो धम्म के संस्थापक 
या केवल साधारण श्रमण 
या हो तथागत , 
या सम्यक संबुध्द..
जो कभी बालक था..
युवा राजकुमार था, 
जो वृध्द हुआ और...
मानविय कालक्रमन की 
अवस्थासे गुजरा हुआ 
 एक साधारण इंसान  ..

हे महामानव तुम हो 
शाश्वत सत्य, 
तुम्हे मिटाने वाले 
कई आघातोसे परे
एक जिॅवत विचार धारा हो तुम ..
तुम मेरा मन हो, 
हर मानव का  मन हो, 
हे बुध्द ...
तुम कोई और नही
प्रबुध्द मानव हो..
ईसिलीये , हे तथागत
मैने तुम्हे कीया  है स्विकार ..
आकर तुम्हारी शरण में ...
आकर तुम्हारी शरण में ...
# संजय वासनिक “ वासु”

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