शीर्षक-* प्रकृति का प्रकोप *
राज्य- मुंबई , महाराष्ट्र
सम्पर्कः- 9869081484
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*प्रकृति का प्रकोप*
ना जाने क्यूँ अब लगने लगने लगा है
कायनात को इंसान नकारा हो गया है
लगता है प्रकृति समाधिस्थ हो गयी है
खुद ही खुद का उपचार कर रही है
सभी नदियाँ अपने आप साफ़ हो रही है
जल स्वच्छ एव साफ़ नजर आ रही है
हवा का रुख़ भी बदल सा गया है
जैसे मौसम ने जैसे करवट बदल दी है
पंछियों का कलरव और फुलों की ख़ुशबू ,
पशुओं का विहार और बछड़ो का मुक्त संचार
जैसे कायनात से इंसान गुम हो गया है
कही दुर तक किसी मंदिर की घंटी नही
कही दुर दुर तक मसजिद से अजान नही
किसी चर्च मे कोइ मास और प्रार्थना नही
कही सत्यनारायण की सामुहीक पुजा नही
ना कोई धार्मिक उत्सव, कोई त्यौहार नही
अब ना किसी को मंगल है
ना ही किसी को शणी का कोप ...
ना किसीको मन्नत चुकाना है
ना ही किसी के पिछे साडेसाती ...
स्मशान में भी कोई विधी नही
ना ही कोई पिंडदान की प्रक्रिया
कौओं को भी उसकी परवाह नही
कालसर्प की पुजा नही ...
नवग्रह सब शांत हो गये है
शुभ मुहूर्त सब अशुभ हो गये ..
करोना ने ऐसा गजब ढाया है
तिस पर कही घनघोर बारिश है
तो कही ओले , तो कही भुकंप
उल्कापात का डर दिल दहलाये
फिर भी सब कुछ ठीक ठाक है
अब कायनात की बारी है
जो इस अंधश्रद्ध इंसान पर हस रही है
उसे किसी बात की परवाह नही
क्योंकी उसने ये सब बनाया ही नही
उसकी एक ही इल्तेजा है
ये मानव नाम के प्राणी
तुम जिओ और दुसरों भी जिने दो
प्रकृति के नियमोंका पालन करो
प्रकृति ने बनाये इस संसार में
इंसान हो इंसान की तरह रहो..।
इंसान हो इंसान की तरह रहो..।
# संजय वासनिक
Nice poem in current situation
ReplyDeleteOnly you can express the current situation in such sweet amazing sentences. Very nice poem.
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