Thursday, May 7, 2020

8 साहित्यकारों द्वारा कोरोना विषय पर दिनांक- ०६ मई और ०७ मई २०२० को काव्य सृजन

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नाम- कुन्दन पाटिल
राज्य- मध्य प्रदेश देवास
शीर्षक- इतिहास बना डाला

इतिहास बना डाला
कोरोना वायरस जो आया
दुनियाँ में भुचाल सा आया।
जनमानस को झकझोड़ डाला
प्रमुखो को परेशान कर डाला।
अब तक जो न हो पाया
कोरोना ने सब करवाया।
जीवन के ख्वाब धो डाले
अर्थ जीवन का समझा डाले।
कोरोना ने गजब कर डाला
इंसानों को कैद कर डाला।
माया मोह राग द्रिवेश का
कोरोना ने लाक कर डाला।
इंसान को हैसियत बता डाली
जीवन का सही अर्थ बता डाला।
अपना पराये का भेद मिटा डाला
पड़ोसी का महत्व समझा डाला।
वायरस ने इतिहास बना डाला
संसार को लाॅकडाउन कर डाला।
कुन्दन पाटिल देवास





______________02______________
 नाम: वर्षा शिदोरे 
राज्य: महाराष्ट्र 
शीर्षक: चलो मिलके सामना करे... 

कोरोना जैसी आज फैली है 
देखो, महामारी पुरे विश्व में 
एक दूसरे के साथ खड़े रहके 
हौसला हम सबका बुलंद रखें 
हर इंसान को दिल से सन्मान देके 
हर एक मानव की तकलीफ़ हम 
अपनों के  जैसी समज के चले 
एक दुसरे के प्रति प्यार, इज्जत से 
दोस्ती का विश्वास से हाथ बढ़ाये 
मानवता का असली समाज धर्म 
पूरी सच्चाई से हर हाल मे निभाए
ऐसी बिकट स्थिति मे सरकार के 
हर एक आदेशों का पालन करे 
पूरी सावधानी से  ख़याल रखें
स्वछता  का पालन  करते हुए 
घर में ही अच्छेसे सुरक्षित रहे
प्रकृति के विनाशकारी भवंडर मे
नया उजाला लानेका उपकार करे 
चलो हम सब एक साथ मिलके 
इस महामारी का सामना करे... 

नाम: वर्षा शिदोरे





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: नाम -उर्वशी तिवारी
राज्य-छत्तिसगढ़
शीर्षक-करोना
                      
मन का द्वार तनिक सा
झांक रहा है किंतु वहां
किसी के एहसास आ जा
नहीं पा रहे हैं समय ने कैसे
करवट बदली अचानक
सारे रिश्तों की गरमाहट
तार-तार सी होने लगी
हर शख्स स्वार्थी सा होने लगा
सभी अपनी जिंदगी को
सुरक्षित रखने को चिंतित हैं
ये शास्त्र की भविष्यवाणी है
या हुआन की गलतियों का
दुष्परिणाम...
                                    
चंहु ओर हाहाकार मचा है
लोगों के चेहरे पर करोना का
दहशत समाया हुआ है
यह आपदा बहुत ही दर्दनाक
और भयावह हो रहा है उन
डाक्टर, नर्सों को हृदय से
प्रणाम है जिन्होंने अपने
प्राणों की परवाह न करते हुए

देश के लिए न्यौछावर हैं
उन पुलिस कर्मियों को भी
हजारों प्रणाम है जो देश की
सेवा के लिए कुर्बान हैं

उर्वशी तिवारी
दुर्ग, छत्तिसगढ़




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नाम - शैलेन्द्र चेलक
पता - पेंडरवानी, बालोद , छ. ग.
छंद -  मुक्तक 
         कोरोना     
 (बीमारी ही नही चिंतन का विषय)
कोरोना !
एक वायरस ,
एक महामारी ,
भयंकर बीमारी ,
जिसने न जाने कितनों की जान ली ,
पता नही और कितना लेगी ,
जिसने उन्नत से उन्नत देशो को भी ,
गर्त में ला खड़ा कर दिया है ,
इसने जीवों पर अत्याचार का बर्बरता से जवाब दिया है ,
इसके होने का एहसास तो सभी को है ,
पर नजर अंदाज करने वालों की कमी भी नही ,
बुहान में उत्परिवर्तन से बना ,
या कोई बनाया ,
दोनों ही संदर्भो में चिंतनीय है ,
जो जन समुदाय की दशा कर दी सोचनीय है ,
खुद बना तो प्रकृति से हमारा खिलवाड़ दिखता है ,
यदि बनाया गया है तो सोचें ,
आगे बढ़ने की होड़ में  ,
इंसान ,समाज ही नही मुल्क भी ,
कितनी वहसी हो गया है, बिकता है,
पर इस वायरस ने एहसास करा दिया है,
कि इंसान कुछ नहीं ,ईश्वर ही परम सत्ता है ,
जो इंसानी करतूतों का ,
बेहिसाब अपने ढंग से बदला लेता है ,
सच ही है जिसने ,
धर्म - मजहब ,जात -पात ,
अमीर - गरीब ,गांव - शहर ,
देश - परदेस की परिपाटी न मानी ,
जिसने ऊंच -नीच न जानी ,
असर से इसके बस ,ट्रेन ,वायुयान के चक्के थम गए ,
मिलों की क्या ? इंसान खुद भी जहां के तहां जम गए ,
एक ओर हाहाकार मची है ,
दूसरी ओर प्रार्थना की पुकार भी ,
परहित , सेवा ,समर्पण ,मानवता फिर बढ़ा है ,
श्रेय नर्स , डॉक्टर , पुलिस ,
सदियों से उपेक्षित सफाईकर्मी के सिर चढ़ा है ,
निस्वार्थ दान बढ़ा ,झूठा अभिमान घटा ,
नम्र हुए लोग ,अमीर गरीब की खाई चलो कुछ तो पटा ,
पर कोरोना के समाप्ति बाद ,
यह बरकरार रह पाएगा ?
या उसी ढर्रे की पटरी पर ,
दौड़ेगा जीवन फिर उसी तरह ,
क्या ? हवा , पानी प्रदूषण मुक्त हो पायेगा ? 
या होगा उचित दोहन ही ,
पंछी कलरव करते स्वच्छंद उड़ते रहेगें ?
प्रकृति की अठखेलियाँ हर जगह फिर दिखती रहेंगी ?
 ..........क्यों नहीं ? 
ईश्वर  ! अवसर देने में कमी नही करता ,
और हमें उस अवसर का लाभ उठाना है ,
      
        --  शैलेन्द्र चेलक  --




______________05______________ 

नाम - डॉ अलका पाण्डेय 
राज्य - महाराष्ट्र ( मुम्बई) 
शीषर्क- लाकडाऊन का सम्मान 

हाथ जोड़ वंदन करो , रहो दो फुट दूर । 
स्वच्छता रखो आसपास , सब को यह समझाओं ।।

खाँसी सर्दी से बचो , यही सुरक्षा आपकी ।
खाँसी बुख़ार हो अगर ,देर न लगाना  दवाई में ।।

दूर ही रहना भीड़ से , निर्देशों का पालन करना 
लाकडाऊन का सम्मान ,कोरोना  को है भगाना ।।

करोना की श्रृखंला को तोड़ना , भीड़ से दूर ही रहना 
हाथो को बार-बार धोना, मास्क को पहन कर रखना ।।

अपनी ज़िम्मेदारी उठाना  ,
कोरोना को है भगाना 
हिम्मत व धैर्य से , परिवार की सुरक्षा करना !!

जागरुकता की मशाल , सभी मिल कर जलाए 
संगठन में है ताक़त , सब को यह समझाये ।! 

कोरोना है महामारी बिकराल , इस से बच कर ही रहना 
राजा हो या रंक सब को प्यार से अपना ज़हर चखाती 

अपना जीवन है तुम को प्यारा तो रहो सबसे दूर 
समाजिक दूरी ही आज सबकी बचा रही है जान !!

डॉ अलका पाण्डेय






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 *01. रचना कार का नाम-* चेतन दुबे 'चैतन्य'

*02.  राज्य-* छत्तीसगढ़
*03.  शीर्षक-* कोरोना(विधाता छंद)

ये कुदरत का कहर है या,कोई शैतान की ताकत।
मुहब्बत से भरे जग में,ये कैसी आई है आफत।।
तुझे ये जानना होगा,तुझे ये मानना होगा।
फसल बोया है जो तूने,चुकाना भी तो है कीमत।।

ये कोरोना बला भी है,सजा भी है दगा भी है।
ये मंजर कातिलाना है,दवा भी है कजा भी है।।
करो पालन एहतियातन,रहे जो घर में मिल-जुल कर।
जो तोड़ो चेन संयम से,वफ़ा भी है मजा भी है।।

मचा हड़कंप दुनिया में,लोगों से लोग डरते हैं।
जिसे जो बदगुमानी थी,वही अब आँह भरते हैं।
भला है या बुरा कोई,ये जाने जानने वाले।
ये कुदरत का कहर है जो,हवा से बात करतें हैं।


चेतन दुबे 'चैतन्य'







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 नाम  -माधुरी मालपानी 
पता -खंडवा ,मध्य प्रदेश 
विषय- कोरोना 

आया एक वायरस,नाम है कोरोना 
जिसने सारी दुनिया को हिलाया ।
इसके अनेकानेक प्रभावों में 
एक ने स्वयं से स्वयं को मिलाया।

 हुआ एकाकार स्वयं से
तो जाना प्रकृति खिली खिली सी है,
आया नया महीना मई का ,
ये भी बुझी _बुझी सी है ।

 हुआ एकाकार स्वयं से
तो मिला वो बचपन ,
जिसे घर के भोजन की मिठास भाने लगी ।
मिला निखरा सौंदर्य ,
जिसमें गुलाबी आभा गालों पर छाने लगी।

 हुआ एकाकार स्वयं से
तो मिली एक मां
जिसका दिल बच्चों को खिलाने के लिए तरसता था 
मिला एक पिता जो 
बच्चों के संग बच्चा बन चहकता था ।

 हुआ एकाकार स्वयं से
तो पाया सड़कें सूनी हैं ,
पर सन्नाटे में चुभन नहीं है।
जेबें खाली जरुर हैं,
पर जीवन से बड़ी
कमाने की लगन नहीं है।

 हुआ एकाकार स्वयं से
तो जाना जिंदगी जीने के लिए चाहिए कितना,
पेट भर भोजन,सर पर छत
तन पर कपड़ा,
बस इतना बस इतना बस इतना। 


माधुरी मालपानी 





______________08______________
नाम -  श्रीमती खेमकिरण सैनी
शहर - बेंगलूरु(कर्नाटक)
विषय - कोरोना
शीर्षक-  करो न उल्लंघन

एक से अनेक को फैलती है बीमारी
इसलिए वायरस का संक्रमण रोकना ज़रूरी है
साम, दाम, दंड, भेद से यह समझाना
पुलिसकर्मियों की बनी मज़बूरी है।

एक अलग ही तरह का  है विश्वयुद्ध छिड़ा 
अदृश्य रहकर भी दुश्मन है ताकतवर।
जंग लड़ रहे कोरोना के खिलाफ़ कुछ योद्धा
जान अपनी दूसरों के लिए जोखिम में डालकर।
नियमों की अवमानना कर मनचले नासमझी दिखलाते हैं
सैर सपाटे को बाहर निकलते मुँह को नहीं ढाँपते हैं।
सामाजिक दूरी की धज्जियाँ उड़ाकर
अनावश्यक भीड़ जुटाते हैं।

स्वास्थ्य कर्मियों पर प्रहार करके
दादागिरी दिखलाते हैं
मंदबुद्धि दुस्साहसी कृत्यों से
वर्दीवालों को उकसाते हैं।

ज़िद्दी और रईस शहज़ादे शहजादियाँ
अकारण सड़कों पर गाड़ियां निकालते हैं
पूछताछ जब पुलिस करे तो
रसूक दिखा धमकाते हैI

ऐसी लापरवाही और गैर-ज़िम्मेदारी से
दुश्मन वायरस का साहस बढ़ता है।
वैश्विक बीमारी के संक्रमण का आँकड़ा
बड़ी तेजी से फिर बढ़ता है।

पुलिस हमारी रक्षक है
हम सबका हित ही चाहती है
प्यार से बात नहीं बनती जब
तब लाठी भी चला देती है।

प्राकृतिक आपदाओं के आघात से
जीवन सामान्य नहीं रहता है।
आपदा प्रबंधन की मुहिम में
जनता का सहयोग तो बनता है!

विवेक से काम लो देशवासियो!
चयन तुम्हें खुद करना है।
अकाल मृत्यु को आमंत्रित करना
या घर में ही सुरक्षित रहना है!

घर तब तक न छोड़ो अपना
जब तक अनिवार्य न हो जाए
न करो उल्लंघन सरकारी अध्यादेश का
जब तक तालाबंदी न खुल जाए। 

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