Saturday, May 16, 2020

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से पदमा साहू की रचना- नारी

रचनाकार- श्रीमती पदमा साहू 
खैरागढ़ राजनांदगांव 
विधा- कविता
शीर्षक- नारी श्रृंगार

कौन नहीं चाहती श्रृंगार करना?
 सभी नारी प्रियतम के लिए श्रृंगार चाहती।
हर कदम में प्रीतम का प्रेम,
जीवन भर खसम का साथ चाहती।
अपने दुःख सुख का साथी बना,
जीवन पथ का विश्वास स्नेह चाहती।
सोलह -श्रृंगार कर लबों पर मुस्कान,
श्रृंगार कर सजना के लिए सजना चाहती।
माथे बिंदी, मांग सिंदूर, हाथ कंगना , 
पांव माहुर अखंड सुहाग का श्रृंगार चाहती।
आभूषणों का श्रृंगार तुच्छ जान,
नारी स्वामी का अगाध प्रेम चाहती।
नारी विधवा बनकर रहना नहीं,
व्रत उपवास कर पति की दीर्घायु चाहती।
अटूट रिश्तो का बंधन जहां,
विरह में भी वीरहणी प्रेम आस चाहती।
तन मन सब न्योछावर कर,
प्रियतमा प्रियतम का श्रृंगार चाहती।



व्याख्या-
यह कविता जिसकी शीर्षक नारी श्रृंगार है, इस कविता में नारी श्रृंगार का वर्णन किया गया है।ऐसी कोई भी नारी नहीं है जो  श्रृंगार करना नहीं चाहती,सभी नारी अपने प्रियतम के लिए श्रृंगार करना चाहती है और सुख दुख में अपने प्रीतम का साथ चाहती है। वह सोलह श्रृंगार कर लबों पर मुस्कान लीए हुए अपने सजना के लिए सजना चाहती हैं और वह अपने माथे पर सिंदूर, हाथ में कंगन, पांव में महावर और अखंड सुहाग का श्रृंगार करती है। नारी  अपने सारे श्रृंगार को तुच्छ जानकर अपने पति के लिए अगाध प्रेम चाहती है प्रेम के अलावा कुछ नहीं चाहती।नारी कभी भी विधवा बनकर नहीं रहना चाहती नारी तो अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत और उपवास करती हैं और यह एक ऐसा अटूट रिश्ता होता है जिसमें विरह के समय भी वीरहनी के रूप में वह प्रेम का आस बंधाए रहती है। और तन मन सब को अपने प्रियतम के लिए न्योछावर कर केवल अपने स्वामी के लिए श्रृंगार करती है।
पदमा साहू खैरागढ़ राजनांदगांव

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