Tuesday, May 5, 2020

मध्यप्रदेश से शरद अजमेरा की रचना- विदाई

कवि शरद अजमेरा वकील भोपाल म प्र 

"बेटी की विदाई"

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घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है उसे एक दिन उड़ जाना है ।।

घर आंगन चहकता तुझसे , हर कोना महकाती थी ।
अठखेलियां करते करते नीरस मन को तू भिगाती थी ।
याद आएगा बहुत तेरा रूठ कर फिर मान जाना है । 
बुलबुल तो बुलबुल है उसे एक दिन उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

सिंदूरी मुख तेरा नव उदित सूरज सा चमकता था ।
रात जब आती चांदनी बन चेहरा तेरा चमकता था ।
तुझ बिन घर बाबुल का अंधियारों से घिर जाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

सताते कभी, मनाते कभी, कभी कभी रूठ जाते थे ।
भाई-बहन चाचा -चाची देख खुशी से भर जाते थे ।
उदास सा दिल तुझ बिन अब उनका हो जाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।। 

जीवन की कैसी माया है दुख भी खुशियां ले आया है 
मन अंदर से रोता पर बाहर उसे खूब समझाया है ।
दिल का दर्द पीते-पीते बिटिया की विदाई हो जाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

रीत कहो रिवाज कहो या कहो फर्ज ये  जरूरी है ।
असह्य वेदना सह कर दिल के टुकड़े से होनी दूरी है ।
इन दुखों में भी छुपा सुखद जीवन का ताना-बाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का छोड़ एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

विदाई की दुखद बेला नित नजदीक आ रही है ।
बुआ फूफा मामा मामी की आंखें भी भीगीं जा रही है 
बिछोह की वेदना में समस्त धरा भी भींग जाना है 
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबूल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

भौंर नवेली जीवन की नयनों में सजा लो तुम 
नव प्रस्फुटित कलियों को मन की बगिया में महका लो तुम ।
शुरू करो पुनीत अध्याय नवजीवन को उत्तम बनाना है 
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का छोड़ एक दिन बिटिया को जाना है ।।

आवाज देकर देखना बाबुल को हर पल पास पाओगी ।
दूर रहकर भी यादों में तन मन मां बाप का महकाओगी । 
बहुत मुश्किल जिस्म से जान का जुदा हो पाना है  ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन से उसे उड़ जाना है ।
घर छोड़ बाबुल का एक दिन बिटिया को जाना है ।।

नव नीड़, नव जीवन का करो नव पथ का सृजन तुम ।
निष्काम नेह उर में भर स्नेहिल मुस्कान का बांधो बंधन तुम ।
सतरंगी इंद्रधनुष नभ से उतार कर ले आना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

स्वर्णिम अम्बर में उड़ी बुलबुल ""अनुभव"" को ले आई ।
मलयाचल के मारूत झोंको को  सांसो में भर लाई ।।
लाज भरे नैनो से  अच्छा लगता तेरा शर्माना है ।।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

उर आहत हो फिर भी मुस्कुराकर ही जीना लेना तुम ।
सब खुशियां जग की उनके जीवन में भर देना तुम ।
धर्म माता-पिता सगों से बढ़कर उनका साथ निभाना है ।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है ।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है ।।

मेरे आंसू मत देखो मेरी मुस्कान सब ले लेना तुम ।
मैं रोता हूं रोने दो..... खुशियां मेरी ले जाना तुम ।
संभव हो तो मेरे आंगन में कभी आ कर चहचहाना  है।
बुलबुल तो बुलबुल है एक दिन उसे उड़ जाना है।
घर बाबुल का एक दिन बिटिया को छोड़ जाना है  ।।

*********""वकील""****


यह कविता एक पिता के मनोभाव बताती है कि बेटी की विदाई से उसे कितनी पीड़ा होती है  ।

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