Saturday, May 2, 2020

छत्तीसगढ़ से सुरेश पैगवार की रचना- जाँगर पेर कमाथौं

रचनाकार- सुरेश पैगवार
स्थान- जाँजगीर, छत्तीसगढ़

शीर्षक- *जाँगर पेर कमाथौ* (सार छंद)

जुग-जुग नव निरमान करे बर, जाँगर पेर कमाथौं।
माटी मा मैं उपजे बाढ़े,         माटी के गुन गाथौं।।

ऊँच-ऊँच ये  महल अटारी,  सबला महीं बनाथौं।
खेत-खार मा अन्न उगा के,   सबला महीं खवाथौं।
दुख-पीरा ला सहि के भइया, कौड़ी दाम ल पाथौं।
आँसू पी के पेट पोंस के, धरम ल अपन निभाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -

नवा राज मा नवा सुरुज के,   करथौ रोज अगोरा।
ये भुइयाँ के पइयाँ लागौं,       जेकर रहिथौं कोरा।
दया मया मैं बाँटत फिरथौं,       राग सुराजी गाथौं।
भेद-भाव मन मा नइ लानँव,सगरो जिनिस बनाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -

हसदो बाँगो बाँध बाँधके,       अन-धन मैं उपजैया।
सड़क रेल के जाल बिछइया,  धरती  सरग  बनैया।
लूटौ झन अधिकार श्रमिक के, जग ला रोज गोहराथौं।
मिहनत कस सब भाई मन के,  श्रम के मान बढ़ाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -

हाँसत कूदत मिहनत करथौं,   राम कहानी गाथों।
जुग-जुग नव निरमान करे बर, जाँगर पेर कमाथौं।।
         
  *सुरेश पैगवार*  
             जाँजगीर, छत्तीसगढ़

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