स्थान- जाँजगीर, छत्तीसगढ़
शीर्षक- *जाँगर पेर कमाथौ* (सार छंद)
जुग-जुग नव निरमान करे बर, जाँगर पेर कमाथौं।
माटी मा मैं उपजे बाढ़े, माटी के गुन गाथौं।।
ऊँच-ऊँच ये महल अटारी, सबला महीं बनाथौं।
खेत-खार मा अन्न उगा के, सबला महीं खवाथौं।
दुख-पीरा ला सहि के भइया, कौड़ी दाम ल पाथौं।
आँसू पी के पेट पोंस के, धरम ल अपन निभाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -
नवा राज मा नवा सुरुज के, करथौ रोज अगोरा।
ये भुइयाँ के पइयाँ लागौं, जेकर रहिथौं कोरा।
दया मया मैं बाँटत फिरथौं, राग सुराजी गाथौं।
भेद-भाव मन मा नइ लानँव,सगरो जिनिस बनाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -
हसदो बाँगो बाँध बाँधके, अन-धन मैं उपजैया।
सड़क रेल के जाल बिछइया, धरती सरग बनैया।
लूटौ झन अधिकार श्रमिक के, जग ला रोज गोहराथौं।
मिहनत कस सब भाई मन के, श्रम के मान बढ़ाथौं।।
जुग-जुग नव - - - -
हाँसत कूदत मिहनत करथौं, राम कहानी गाथों।
जुग-जुग नव निरमान करे बर, जाँगर पेर कमाथौं।।
*सुरेश पैगवार*
जाँजगीर, छत्तीसगढ़
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