जिला- राजनांदगाँव (छ ग)
विधा- कविता (मुक्त)
शीर्षक - मैं सड़क हूँ!
मै सड़क हूँ!
मेरी पहुँच बहुत दूर तक है !
जहाँ वी.आई .पी . की नहीं !
मैं साफ -सफाई रहूँ!
हर समय नया रहूँ !
ऊबड़ -खाबड़ न रहूँ!
पथिक को चोट न लगे !
कोई मेरे कारण न मरे !
सदैव मेरी प्रयास रहता है!
जी हाँ मैं सड़क हूँ!
मैं सेवा में सदैव तत्पर रहता हूँ!
जीतना वी.आई. पी. नहीं!
मैं कच्चे -पक्के ,टेढ़े - सीधे
नरम-कठोर , मोटे- पतले!
भूरे- लाल, काले - पीले !
गिट्टी -मुर्म, कांक्रीट सिमेंट
पत्थर -सरिया डामर
मैं कई रूपों में बना हूँ!
जी हाँ मैं सड़क हूँ !
मेरी मजबूती जैसा
वी.आई. पी. का घर नहीं!
गाँव शहर कस्बे
सभी जगह मेरी जाल है !
मेरे से होकर कही भी चले जा!
लाखों आगे बढ़ गये !
मैं वही का वही हूँ !
मैं खडा़ हूँ!
जी हाँ मैं सड़क हूँ !
मैं तीनों काल को देखा हूँ!
जो वी.आई. पी. देखा नहीं !
मैं सेवक हूँ!
सेवा करना मेरा धर्म है !
पर मै बहुत दुखी हूँ!
लोगों की अमानवीय कृत्यो से !
मैं जितनी जिम्मेदारी निभा रहा हूँ!
उतने मानव भी निभाये !
जी हाँ मैं सड़क हूँ!
मैं अपार दुख की सागर में डूबा हूँ !
जितना वी.आई. पी. नहीं !
वाह वाह भाई ,,जोरदार,,,यही तो साहित्य है,, बधाई व अशेष शुभकामनाएं👌👌💐💐
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