पता-पेंडरवानी , बालोद ,
छत्तीसगढ़
शीर्षक - असहाय मजदूर
असहाय मजदूर
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श्रम कर जो विकास लाये ,
उन्ही से आया , जग में विहान है ,
घर बार छोड़कर लगे रहते कार्य नित ,
उनके लिए तो बस काम ही जहान है ,
नंगे तन , अकुलाते बच्चे ,टूटे से घरौंदा एक ,
उस बेबस की बस यही पहचान है ,
कभी फुटपाथ पर गुजर जाती जिंदगी ,
मानो धरती हो आंगन और छत आसमान है ,
खुद रो हँसी दी , जग को खुशी दी ,
गढ़ता नित दूजे हित न जाने क्या-क्या वो सामान है?
चाहत उसकी कि वो भी उपभोग करे ,
सुख के वो साधन पर नही उन्हें आसान है ,
संभालते जग को वो ,जब खुद भी सम्भलना चाहा ,
विपत्ति में बंद उनके जो छोटे-छोटे से दुकान है ,
विपदा आई , जो विनाश लाई ,
भूखे -नंगे बच्चे पैदल चलने मजबूर हैं ,
घर तो उनका वो भी था पर अब दाने नही ,
उनको जाना वह घर जो कि मिलों दूर है ,
जग झूमें मादकता में खुद पे इतराते हुए ,
उनका परिहास करते जो बेघर मजदूर है ,
पैर पड़ते न सही विवश लाचारी से ,
पर ऐसे- जैसे मानो वे भी मद में चूर है ,
राह थी तो घर की पर जाती रब दर को ,
क्योंकि धनहीन ,बलहीन, लाचार -मजबूर है ,
जग देखे करुण हो ,कुछ तृण -तृण होते ,
दम तोड़ा जो सफर में वो असहाय मजदूर है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
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