स्थान-नवापाराखुर्द /सक्ती
जिला--जांजगीर -चाम्पा
राज्य-छत्तीसगढ़
विधा--कविता
शीर्षक---सावधान
ब्याख्या---एक ब्यक्ति जिसकी मित्रता अच्छे लोगों से न होकर बुरे लोगों से रहता है नायक को जब यह ज्ञात हो जाता है तब उस ब्यक्ति को समझाते हुए कहा जा रहा है कि मेरे क्रोध से तुम बचो ये बात मैं सीधा तुमसे कह रहा हूं इधर उधर घुमाने वाली बात नहीं है मैं जिस तरह शांत दिखाई पड़ रहा हूं वैसा नहीं हूं मेरे विचार आग की तरह है जो इसके लपेट में आयेगा जलकर खाक हो जायेगा तुम उतने समझ बूझ वाले नहीं हो इसलिए तुम्हें छोड़ रहा हूं ।तुम में मुझे कोई अवगुण नहीं दिख रहा है जो है सब संगत के कारण है जिन लोगों के साथ जिधर जा रहे हो जो कार्य कर रहे हो उसमें जलने की संभावना अधिक है अभी समय है अपने को बचाले जिन्हें अपना समझ रहे हो जहर से कम नहीं है तेरे पास जीवन है वह सब कुछ है भले ही सोच रहा है मेरे पास कुछ नहीं है वह सब गलत है अभी दुनियां देखा ही नहीं है जीवन बहुत ही बहूमूल्य है कुछ लोगों के साथ भटक रहा है सब गलत संगत वाले हैं मै जो कह रहा हूं वह गलत है सही है उसके बारे में कुछ बोल चुप मत रह मेरे जो बात है उन्हें कोई झूठला नहीं सकता बातें जो उत्तम होती है उनको मानना सीख उत्तम बातें हरदम ही उत्तम रहते हैं हमेशा आकर्षक होते हैं मानव ही क्या ये दस दिशाएं भी उनके आगे नतमस्तक हैं उन्ही की वजह से यह दुनियां चल रहा है तू सही राह का अनुकरण कर तुझे मेरा कल्याण करने वाली आशीष है जिस आशीष के कारण से दुनियां चल रहा है गलत साथियों का साथ त्याग दे मैं तुझे सावधान कर रहा हूं ।
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सावधान
मेरे क्रोध से तू बच, मैं सीधा कह रहा ।
न समझ मुझे तू शांत, आग सा जल रहा ।
इसकी लपेट में आयेगा,राख हो जायेगा ।
दूर हो निर्बोध इसलिए, तुझे मैं तज रहा ।
तुझमें कुछ अवगुण नहीं,तेरी संगत बुरी ।
उधर आग ही आग है,जिधर तू चल रहा ।
अभी भी अपने आपको,बचाले लोगों से ।
वो विष से कम नहीं,जो अपना लग रहा ।
तेरे पास बहुत कुछ है ,उनको बचा सकता है ।
भले आज जीवन तूझको ,न प्रमुख लग रहा ।
अभी दुनियां कहां देखा,जिसका बहुत मोल ।
क्यों कुछ लोगों के साथ , यहां वहां भटक रहा ।
मौन मत हो दे स्वीकृति, मैं ये चाहता हूं ।
कोई न झुठला सका,जो बात सच रहा ।
कद्र करना सीख जा,हर उत्तम बातों का ।
उत्तम जो में जग में रहें, हरदम चमक रहा ।
दशो दिशाएं उत्तम के ,सामने नतमस्तक ।
श्रेष्ठता हैं वजह जिससे ,दुनियां चल रहा ।
भविष्य तेरे उज्जवल, होगें आशीष है ।
आशीषों के बल पर,ये जग बदल रहा ।
APki Kavita bahut achchi lagi sir. Ise padhkar apke Anya Kavitaon ko padhne ki jigyasa ho rahi h...apki Anya rachnaye kaha padhne ko mil sakti h?
ReplyDeleteBhut hi achha sir..
ReplyDeleteAapne jis trh se apne mitr ke prti apni bhavnaye jahir ki hai vah bhut hi achhi hai...
Aapke vyakhya m btaya gya hai ki bure logo k sath sangati nai rakhni chahiye sadev achhi vichar rakhni chahiye y kavita bahut hi prernadayak hai
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर रचना है। भैया
ReplyDeleteहम सभी इन अमूल्य वाक्यों अनुसरण जरूर करेंगे। हो आशिष आपका,विनम्र मन में आयेगा। हो अनुसरण इनका,जग कि दिशा हि बदल जायेगा।।
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना है 👌👌👌
ReplyDeleteमहोदय आपके द्वारा रचित "सावधान" उच्चकोटि की एवं हृदय स्पर्शी कविता है.... आपने कविता के माध्यम से जिस प्रकार,मित्र को बुरे संगत से दूर रहने हेतु सावधान किया है तथा सही राह का अनुकरण करने हेतु प्रेरित किया है वह बहुत ही उत्तम है।
ReplyDelete����������������
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना है
ReplyDeleteVery nice uncle🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteBahut sundar rachna h uncle ji apke dwara rachit 'savdhan' rachna
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर
ReplyDeleteBahut hi achhi kavitaye hai.is kavita ke madhyam se is samaj me ek achha sandesh jayega.
ReplyDeleteBahut hi sudhar Kavita Hai aur bahut motivational line hai
ReplyDeleteVery Nice Uncle ❣️👌👌👌👌
ReplyDelete🙏🙏🙏🙏
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