जिला- जांचगीर-चांपा
स्थायी भाव- क्रोध(रौद्र)
हवन कुंड़ में पिता के
सती ने जान गंवाया है,
सुनकर के बात अब तो
भोला बड़ा बौराया है।
सती वियोग न सह पाया
और दौड़ते आया है,
देख सती के मृत देह को
रौद्र रूप अपनाया है।
ले काँधे में सती को
रूप भयंकर पाया है,
करने लगे ताँड़व भोले
तीनो लोक डगमगाया है।
कटने लगे अंग सती के
गिरते ही हुए विलुप्त,
कटा अंग एक्यांवन भागो में
शक्ति पीठ हुआ निर्माण तब।
देख भोले का रूप निराला
धरती अँबर ड़ोले हैं,
तीनों लोक के देव गंधर्व
भोले को मनाने दौड़े हैं।
करने लगे अनुनय विनय
शांत शांत हो हे देव,
प्रसीद प्रसीद प्रभु पुकारते
त्राहिमाम त्राहिमाम हे देव।।
लता शर्मा
जांजगीर (छग)
बहुत सुंदर👌👌
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना है
ReplyDeleteबहुत सुंदर काव्य रचना
ReplyDeleteआशीष तिवारी