जिला- महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक- खुल गई है मधुशाला
विधा- मुक्तक
बिकने लगी मदिरा,खुल गई है मधुशाला।
लंबी लंबी कतारें,छलक उठी है प्याला।
भूखे प्यासे मदिरा के,दौड़ पड़े पीने वाला।
चालीस दिन शांति रही,धधक उठी अब ज्वाला।1।
जीडीपी बढ़ाने को शराब बेच रही है सरकार।
अर्थव्यवस्था पटरी पर होगी,करेंगे उनका आभार।
पर सब्र का बाँध टूटे,लॉकडाउन न हो जाये बेकार।
बंदिशें खुली हैं,न मच जाए कोरोना की हाहाकार।2।
कोरोना तूने कैसा कहर है ढाया,पूरा संसार घबराया।
मंदिर मस्जिद बंद पड़े हैं,40 दिन बाद मधुशाला खुलवाया।
राशन पानी फ्री में मिले,जीडीपी की आस में देखो।
तपती गर्मी में,महंगी शराब के लिए लोगों को कतार में लगवाया।3।
मंदिर मस्जिद वोट दिलाये,नोट दिलाये मधुशाला।
कोरोना से हाहाकार मची,भीड़ जमाये मधुशाला।
भर भर झोली ले जाते,चेहरे चमकाए एक दो प्याला।
सड़कें बाजारें बंद पड़ी हैं,खुल गई है मधुशाला।4।
सुन्दर लाल डडसेना"मधुर"
व्याख्या- इस कविता में कोरोना काल में 40 दिन बाद शराब दुकान खुलने से मची हाहाकार को इंगित करते हुए यह कविता लिखी गयी है
👌👌👌👌👌👌
ReplyDeleteOsm line hai sir ji
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