जिला- कोरबा छत्तीसगढ़
विधा-कविता
शीर्षक--" शांति की विलाप "
प्रस्तुत है कविता-
तड़प तड़प कर कह रही है शांति,
अपने प्रियतम की तलाश में,
जाने से पहले इतना तो बता देते ,
मैं रहूँ कहाँ ?
क्या उस धर्मांन्ध के पास !
जो काट रहा है खुद के दुसरे हाँथ को ।
या कानून के उन ठेकेदारों के पास !
जो लुट रहे हैं देश की
जनता को ।
नहीं! मैं अपना अस्तित्व मिटा लूंगी,
मगर रहूँगी अपने प्रियतम मानवता की कुटिया में ।
मुझे शांति मिलेगी मानवता की आगोश में ।
।।इति।।
ब्याख्या--आजकल मनुष्यों में दिनों दिन मानवता खतम होती जा रही है ।
इसी को रचनाकार सजीव चित्रण करते हुऐ कह रही है --
जहाँ मानवता नही रहेगी वहाँ शांति भी रह ही नहीं सकती ।
शांति अपने प्रियतम मानवता की खोज करते हुए कह रही है -जानें से पहले इतना तो बता जाते कि मैं कहाँ रहूँ । क्या धर्म के लिए लड़ने वालो के पास ? या कानून बनाने के उन जवाबदारों के पास जो लूटते हैं देश की जनता को? नहीं मैं अपना अस्तित्व मिटा लूंगी मगर रहूँगी अपने प्रियतम मानवता की कुटिया में । इस कविता के माध्यम से रचनाकार कह रही है कि शान्ति का निवास वहीं हो सकता है जहाँ पर मानवता हो ।
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गोमती सिंह, कोरबा छत्तीसगढ़
शांति की विलाप कविता के माध्यम से कवियित्री मानवता की तलाश कर रही है।जो अत्यंत प्राशंगिक है 👌👌
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
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