जिला:- सूरजपुर, छत्तीसगढ़
शीर्षक:- पिता की जिम्मेदारी
विधा:- कविता
पिता कभी न हारता कभी न घबराता!
घर का बोझ लेकर कांधों पर चलता!!
बच्चों पर कभी कष्ट न आए!
इसकी फिक्र उसे हमेशा सताए!!
कितनी भी आंधी तूफान आए!
अपने कामों से कभी न घबराए!!
पिता कभी न हारता कभी न घबराता!
घर का बोझ लेकर कांधों पर चलता!!
खून पसीना मेहनत कर कमाता!
चौका चूल्हा परिवार का चलाता!!
जन सहयोग में अपना देता योगदान!
छोटे बड़ों सबका करता सम्मान!!
पिता कभी न हारता कभी न घबराता!
घर का बोझ लेकर कांधों पर चलता!!
पिता सूर्य समान बड़े दिल है रखता!
सबको उनके लक्ष्य तक पहुंचाता!!
ये है तो घर की है शान!
इनका डांट है जैसे वरदान!!
पिता कभी न हारता कभी न घबराता!
घर का बोझ लेकर कांधों पर चलता!!
देता माता ममता और पिता दुलार!
जग में इनकी महिमा अपरंपार!!
इनके रहने से घर की होती है मान!
जो आये उनको बराबर मिलता सम्मान!!
जग में इनसे बड़ा कोई न दूजा!
गुरु समान होती है इनकी पूजा!!
पिता कभी न हारता कभी न घबराता!
घर का बोझ लेकर कांधों पर चलता!!
- कृष्ण कुमार ध्रुव
व्याख्या:- एक पिता की जिम्मेदारी जो कठिन परिस्थिति होते हुए भी अपने परिवार को कोई आंच नहीं आने देता, पिता के दायित्वों को इंगित करती यह कविता।
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