जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- मीत मया
विधा:- दोहा" (अनुप्रास अलंकार)
"दोहा" (अनुप्रास अलंकार)
मीत मया
मन मंदिर मैं राखहूँ, मान मया ला मोर।
मंसा मन मा मत रहै, फेर मोर बर तोर।।
सांस सांस मा साजहूँ, सरबस सब दिन रोज।
अंतस आँखी आंजहूँ, अऊ मया झन खोज।।
भितरी भीतर मा भरे , तोर मया के भार।
आना आके झाँक ले, आँतर मया अपार।।
पिरित परेवा ला बने, पाल पोंस के राख।
पतझर पाथर झन परे, साधन करले लाख।।
कतको करले कर कथा, काँही कारज काम।
सबके साध कहाँ सधे, मया ओखरे नाम।।
व्याख्या-
दोहा अउ अनुप्रास अलंकार म रचित रचना के माध्यम ले रचनाकार ह एक प्रेमी अउ प्रेमिका के मया ल दर्शाये के कोशिश करे हे, प्रेमी अपन प्रेमिका ल कहत हे के मैं हर तोला अपन हिरदे के भीतरी म बसाके राखे हँव मोर मया ल मान ले, अउ जऊन मोर प्रति तोर मन मा संसा हे ओहा फेर मत रहय, हर साँस म हर दिन हर रोज आँखी म काजर जइसन समाय हँव, अउ मोर मया ल कोनो डाहर झन खोज।
अही प्रकार जम्मो पंक्ति के भाव स्पष्टीकरण हे.।
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