Tuesday, May 26, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- रमता जोगी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
विधा:- कविता
भाव :- रति
शीर्षक:- रमता जोगी

           रमता जोगी


ओ मृगनयनी, मनमोहिनी,
 मंद - मंद मुस्काती हो,
अपने नैन नेह बाण से, 
हृदय आघात कर जाती हो।
कोयल की सी बोली तेरी, 
मिठा गीत सुनाती हो,
चुलबुल, चंचल भाव से अपने,
मन हर्षित कर जाती हो।
सदा सुनहरे सपनों में मेरे, 
नित ही तुम आती,
नीद ना आती नैनो को रैन में, 
चैन मेरा चुराती हो।
काश कभी भी ऐसा होता,
ख्वाब नहीं, खुद तुम आती,
और आकर पास में मेरे,
सुमन सरीखा मुस्काती ।
तुम जो आती ऐसा लगता,
ज्यों बसंत आया हो उजड़ी बगीया में,
चाँद सितारे ज्यों चमक उठे हो,
पूनम की उजली रतिया में।
ओ प्रियतमा, प्रेम पुजारन,
मैं तेरा हूँ प्रेम का रोगी,
नेह में तेरे सब सुध खोकर,
बन गया मैं अब रमता जोगी।



व्याख्या:- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार अपने प्रेयसी को संबोधित करते हुए कहते हैं की हे प्रियतमा तुम्हारी सुन्दरता ने मेरा मन मोह लिया है। लेकिन क्यों तुम केवल सपनों में ही आती हो, काश कभी तुम वास्तविकता में मेरे पास आओ तो मेरे हृदय बगीया में बसंत लौट आएगी। और मैं तुम्हारे प्रेम में इतना पागल सा हो गया हूँ कि आज मैं रमता जोगी हो गया हूँ ।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...