Friday, May 22, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- परदेसी के मया

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
शीर्षक :- परदेसी के पीरा
विधा :- कविता


का बताओ रे पीरा जहुंरिया,
परदेस ले आए के।
नई मिले सकौं लोग लईका  मनला,
गांव सीमना मा आई के।
बंद परे हंव, कई दिन ले मय,
स्कूल के चार दीवारी अंदर।
दुख मा मोर चोला सुखागे,
नइ चलै जहुंरिया मोर जांगर।
टुकुर - टुकुर देखे टुनटुन,
आँखी मा गंगा बोहावत हे।
देख टुरा ला धुरिया ले ही,
सियानिन के चोला पिरावत है।
छुटकी कइथे, सुन गा ददा,
जल्दी घर तैं आ जा न।
चुहत हवय छानी - परवा,
ओला तैंह बना जा न।
दाई के पीरा ला का ला बताओं,
आँखी - कान ह झुंझरावत हवय।
जवान बेटा ला बंद देख के,
मन मा ओहा सकपकावत हवय।
बाबू के पीरा देख के मय हर,
मन ही मन मुरझावत हंव।
लालच मा आके, जाके मय विदेस,
संगी अड़बड़ पछतावत हंव।
कान पकड़ के खांवव मे किरिया,
नइ जावंव अब परदेस म।
खाहुँ भले मैं बासी पोसिया,
रहिहों संगी मैं देस म।


व्याख्या :- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने उन प्रवासी मजदूरों की पीड़ा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि किस प्रकार वे कमाई के लालच में परदेश चले गए थे। और कोरोना महामारी के कारण वे गांव आकर भी अपने परिवार से मिल नहीं पा रहे हैं।

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