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रचनाकार - प्रवीण कुमार ठाकुर ,
जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)
विधा - कविता
शीर्षक - अश्क
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।।१।।
अश्क देखकर आँखों में ,
अक्सर लोग ये कहते हैं ।
दर्द अगर दिल में हो तो ,
अश्क बयान ये करते हैं ।।
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।।२।।
हो खुशियाँ जो मन के भीतर ,
नजरों से छलक ये जाते हैं ।
दिल मे छिपी दास्तान कोई ,
भींगी हुई नम आँखें सुनाते हैं ।।
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।।३।।
थम जाए अश्क जो आँखों में ,
शबनम है लोग ये कहते हैं ।
बन दरिया अश्क जो दस्तक दे ,
अश्क बारहां तबाही कहते हैं ।।
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।।४।।
गम का तराना कहें इसे ,
या खुशियों का पैमाना ।
दिल के हर पहलु का अक्सर ,
अश्क अफसाना कहते हैं ।।
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।।५।।
पढ़ लो अगर निगाहों से ,
अश्क मन का एक अल्फाज है।
नाकाम हुए जो इनमे तो ,
अश्क सवाल ये करते हैं ।।
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व्याख्या :--
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प्रस्तुत कविता में कवि ने आँसू के
विषय में वर्णन किया है ।
१ . इस पंक्ति में कवि कहते हैं कि
यदि किसी के आँखों से अश्रु
निकलते हैं तो उनके मन में दुख
होता है ।
२ . यदि की आँखों में आँसू दिखे
तो गम का होना स्वभाविक होता
है । परन्तु अधिक खुश होने की
दशा में भी खुशी के आँसू निकल
आते हैं ।
३ .
अगर आँखों में आँसू थम जाए तो
ठीक है वरना इनका बहना
बरबादी का सबब बन जाता है ।
४ . आँखों से बहने वाले आँसू
सुख और दुख दोनों ही स्थितियों
का बखान करते हैं ।
५ . कविता की अंतिम पंक्ति में
कवि कहना चाहता है कि यदि
हम आँसू को पढ़ सकते हैं तो
ये हमें मन की सारी बातें बता
देती है ।
नहीं तो ये आँसू हमारे लिए उम्र
भर के लिए सवाल बन कर रह
जाती है ।।
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