*महासमुन्द* *(छत्तीसगढ़)*
*धरा*
*विधा*
जेठ दुपहरी की तपन, बढ़ी धरा की प्यास।
जाने कब पावस दिखें, सब मन में हैं आस।।१।।
★★★
पल पल बदले यह धरा, अपना रंगत रूप।
पल में बारिश की झड़ी, पल में निकले धूप।।२।।
★★★
धानी ओढ़ चुनर धरा, हैं रत्नों की खान।
मान कर जननी जिसे, हम सब करते ध्यान।।३।।
★★★
मानवता जब क्षीण हो, विपदा करती वास।
तब घुटने लगती धरा, कर उपचार तलाश।।४।।
★★★
आज प्रदूषण हैं बना, इस जग का जंजाल।
कैसे सहपाए धरा, निज बच्चों की काल।।५।।
*व्याख्या*:-
१. कवि इन पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि जेष्ठ मास की इस तपते समय में धरती मैया की प्यास बड़ गयी है, अर्थात धरती प्यासी है। और सबका मन इसी इंतजार में है कि जाने कब बारिश ( पावस ) हो।
२. कवि इन पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि धरती अपनी रंग - रूप प्रतिपल बदल रही है, यहाँ पल भर में ही बारिश का मौसम आ जाती है, और पल भर में ही धूप खिल जाती है।
३. कवि इन पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि धरती धानी रंग की चुनरी ओढ़े रखी है, अपने अंदर इसने कई रत्नों को समेटे रखा है। साथ ही धरती को हम सभी माता का दर्जा देते हैं और सदा ही धरती माँ को अपने हृदय में बसाकर रखते हैं।
४. इन पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि धीरे - धीरे धरती से मानवता नष्ट होते जा रही है, जिसके कारण धरती में संकट घर कर रही है। धीर - धीरे धरती घूटन महसूस कर रही है, और आज समय है एक उचित उपचार की ताकि धरती को बचा सके।
५. इन पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि आज प्रदूषण के दानव ने संसार को एक अजब जाल में जकड़ लिया है और इन सब का कारण खुद मानव है इसी कारण धरती चाह कर भी अपने पूत के इस दर्द को सह रही है।
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