Wednesday, May 13, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- सुख की चाह

उर्मिला सिदार
बुलाँकी , रायगढ़  ,छत्तीसगढ़
 विधा -कविता
 शीर्षक- "सुख की चाह"


 1. मन में सुख की चाहत है ,
तुम्हें सुख कहाँं से मिलेगा ,
प्रकृति प्रदूषण करने वाले ,
तुझे राहत कहाँ मिलेगा।.
2.
 प्रकृति नियम का पहचान नहीं,
 नियम बनाने चले हो तुम,
 मानवीय नियम मे निश्चिता कहांँ,
  भ्रमित जंजाल में पड़े हो।
3.
   कितना दिन बेहोशी में  जिओगे
   मानव,
    जरा होश में तो आओ,
   प्रिय ,हित ,लाभ,के चक्कर में,
   तुम खुद को मत गँवाओ।
4.
 क्या है ?लक्ष्य तुम्हारा मानव,
तुम कभी परिशीलन किए हो,
 लक्ष्य का ठिकाना नहीं तो क्या?
तुम खुद का मनन किए हो।
5,
 भोगो उन्मादी विवश जिंदगी से,       अभी भी मन नहीं भरा है,
  जिसमें सुख की निरंतरता नहीं, फिर भी उसी में क्यों लगा है।
6.
 मन में तो सुख की चाहत है ,
तो क्यों ,सुविधा संग्रह में भिड़े हो, सुविधा -संग्रह ही तुम्हारा सुख है,
 तो क्यों जिंदगी में अतृप्त हो।

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