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शीर्षक - मुफ़लिसी
मुफ़लिसी
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मुफ़लिसी के आलम में भी,
शहंशाह के तरह जिया करते हैं ,
मुस्कुराहट रहती है होंठो पर ,
गम का प्याला पिया करते हैं ,
जमाना कल भी मेरा था ,
जमाना आज भी मेरा है ,
यही सोचकर हम ,
आज का गुजारा किया करते हैं ,
तू भी तंगहाल महलो में ,
मैं सड़क में सही ,
क्या ? हुआ कि तेरे दरख्तों का ,
किनारा किया करते हैं ,
कुछ नहीं मेरे पास ,
तो कोई गम भी नही ,
भरी मुफ़लिसी में भी हम ,
हँसी का नज़ारा दिया करते हैं ,
गर कोई सामने आए ,
दो रोटी देने को कभी ,
तो मुझपर जलालत भरे ,
इशारा किया करते हैं ,
जाएगा एक दिन तू भी ,
चार कांधो में मेरी ही तरह ,
फिर किस बात पर यूं ,
गुमां का नज़ारा किया करते हैं ,
सोच मेरी मुफ़लिसी ही सही ,
तेरी बे -अदबी ,
हम न तेरे अदबों पे ,
जुबां सिया करते हैं ,
मुफ़लिसी के आलम में भी ,
शहंशाह की तरह जिया करते हैं ,
- शैलेन्द्र चेलक -
Kya bat h .bhoot khoob
ReplyDeletebahut hi sundar i like
ReplyDeleteआप लोगोँ का आभार
ReplyDeletekya khub
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