पता - ग्राम भरदा जिला बालोद छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक - " कोरोना का एक और रूप "
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कल तक जहां पर थमती नहीं थी भीड़ ,
आज वहीं पर दिन में कुत्तों को भी अकेले सोते देखा है ।
झूमते रहते थे मच्छर जिन गड्ढों में ,
दवाइयों के मार से उनके अंडों को तैरते देखा है ।
लगे रहते थे ढेर जहां गांव भर कचरो से ,
वहीं आज लोगो को कचरा फेकते भी नहीं देखा है।
कल तक जो कहते थे कि समय नहीं मिलता ,
आज उन्हें ही परिवार संग समय गुजारते देखा है।
कल तक जिनको अपने बच्चो को देखने तक का समय नहीं मिलता ,
आज उनके पास बैठकर गप्पे लड़ाते देखा है ।
फ़ुरसत नहीं मिलता था जिन्हें अपने काम से ,
आज उन्हें परिवार संग चैन से आंहे भरते देखा है।
एक मां अपने जिस बेटे को कहती थी निकम्मा ,
आज छुट्टी न मिलने पर उसके लिए बिलखते देखा है।
परिंदों को पकड़कर पिंजरे में कैद करते थे जो लोग ,
आज खुद कैद होकर उनका जी मचलते देखा है।
जिस पत्थर को भगवान मानते हैं लोग ,
आज उस भगवान के एक रूप को चिकित्सक में बदलते देखा है।
बहुत व्यंग्य , नारे करते थे जो लोग नेताओ पर ,
आज दुश्मन को भी उनका अनुसरण करते देखा है।
धर्म और जाति के नाम पर आंशिक खंडित होता था जो देश ,
आज उसी देश को कोरोना के कारण एकजुट होकर चलते देखा है।
कहते हैं कि कोरोना ने दूरियां बढ़ा दी है ,
पर आज मैंने लोगो को घर में रहकर दूरियां घटाते देखा है।
लाख गालियां दे दो कोरोना को ,
पर मैंने कल से बेहतर आज दुनिया को बदलते देखा है.....
संजय कुमार साहू
छत्तीसगढ़
Right bat
ReplyDeletebeautiful poem
ReplyDeleteसही बात
ReplyDeleteNice line topper
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