नई दिल्ली,
कविता का शीर्षक : चेतावनी,
चेतावनी
हर दौर में एक दौर ऐसा आता है
खुशी पर ग़म भारी पड़ जाता है।
कोरोना डर नहीं ये चेतावनी है
बस बरतनी थोड़ी सावधानी है।
हाथों को बार बार पड़ेगा धोना
चेहरे को मास्क से होगा ढ़कना
हाथों में ग्लब्स भी होगा पहनना
यही कुछ सतर्कता निभानी होगी।
जनता कर्फ्यू में दिया साथ जन जन ने
वर्क फ्रॉम होम स्वीकार लिया हर मन ने
सेल्फ सेनीटेशन का रखना होगा ध्यान
घर घर में यही जागरुकता फैलानी होगी।
आइए करें सम्मान आइसोलेशन का
बढ़ाएं दायरा सकारात्मक सोच का
लॉकडाउन का यह समय बिताएंगे
एकांतवास को रचनात्मक बनाएंगे।
हर दौर में एक दौर ऐसा आता है
खुशी पर ग़म भारी पड़ जाता है।
कोरोना डर नहीं ये चेतावनी है
बस बरतनी थोड़ी सावधानी है।
सुजाता प्रसाद
नई दिल्ली
No comments:
Post a Comment