शीर्षक-*बाबासाहाब*
राज्य- मुंबई , महाराष्ट्र
सम्पर्कः- 9869081484
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*बाबासाहाब *
( यह कविता डाॅ. गिरीश जखोटीया के किताब के एक लेख पर आधारीत है )
बाबासाहाब....
आज मै देख रहा हुं...
लेकर आपके नाम का सहारा...
कई लोग रंक से राजा बन गये...
और भुला दिये बहुत आसानी से
आपके बताये हुये...
दशा, दिशा और मार्ग ...
भुल गये की वो क्या थे...
भुल गये की वो कौन थे...
बडी आसानी से दी जा रही है...
"तिलांजली" सत्ता की लालच मे,
आपके क्रांतीकारक विचारोंको..
बदल रहे है अपना रंग,
गिरगीट की तरह....
हर कोई डुबा जा रहा है...
अपने ही अहंकार मे,
"प्रज्ञा"के नाम पर चला रहा है,
बाज़ार अहंकारो का ...
और बेची जा रही है
दीन और हीनों के बिच ....
"खुद की मुंह मीठ्ठु मीयां “ वाली बातें...
बुध्द के वैज्ञानिक विचारों का,
किया जा रहा है कत्ल सरेआम...
बढ रहा है भोगवाद, ऐहिक सुखोपभोग..
अर्थ के लिये, अर्थो का जमावडा ...
हो रहा है अपना जमीर बेचकर...
बाबासाहाब,
आज आपके कई लोग,
भटक रहे है दिशा हीन...
सरे बाजार सौदा हो रहा है...
विचारों का आपके..
गीर रहा है मनोबल दिन ब दिन ...
बढ रहा है आक्रोश दीन हीनोंका...
भुल गये वो लोग उस समाज को..
जिससे लेकर आपका सहारा ..
बन गये तथाकथित "बडे लोग"...
बन गया है एक दिन का "उत्सव"..
उनके लीये आपका त्याग और
आपकी मेहनत...
स्वार्थ के लिये बदल रहे है दल..
बदल रहे है वेश और भेष भी...
किंतु
बाबासाहाब
शहरोसे दुर गांव गांव मे..
एक अल्पशिक्षीत मासूम युवा वर्ग,
कर रहा है कोशिश..
समझने की आपके विचारों को ..
जुझ रहा है जिदंगी की उलझनो से..
कर रहा है कोशिश चलने की..
आपके बताये हुये मार्ग पर..
देख रहा है सपने स्वउध्दार के ...
बाबासाहाब .
एक वर्ग भी है,
निस्वार्थ सेवको का ...
है प्रयत्नशील,
गांव से शहर तक ...
फैला रहा है संदेश ज़र्रे ज़र्रे में आपका...
कर रहा है आपके आदेशों का पालन...
और कर रहे है कोशीश सबक़ सिखाने की
पहचान कर उन्हे और उनके कारनामे ..
जो सिर्फ सोचते है केवल स्वार्थ...
बाबासाहाब...
आज आपकी जन्मदिन के पर्व पर..
मै खुद को याद दिलाना चाहुंगा ...
मेरे जिम्मेदारी की,
खुद को बदलने की,
आपने बताये हुये
मार्ग पर चलने की,
शोषित, पिडीत, दलित,
और वंचीतो के लीये...
कुछ करने की...
जिसके लीये काफी है...
तुम्हारे विचारों के सागर का ..
एक बुंद, केवल एक बुंद ...
# संजय वासनिक
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