-उ.प्रदेश
-पृथ्वी की पीड़ा
"पृथ्वी की पीड़ा"
रवि गर्भ से उपजी,ताप ने मुझे बनाया है,
छोड़ उँगली पिता की ,अस्तित्व अपना पाया है,
वियोग में पिता के तपती रही मैं बरसों,
फिर रो रो नीर बहाया है।।
ताप और जल शक्ति से ये जहाँ बनाया है।
" गर्भ में तेरे खनिजों का भण्डार समाया है"
अपनी पीड़ा का लावा गर्भ में फिर दबाया है।
कर श्रृंगार प्रकृति ने,दुल्हन मुझे वनाया है।
जन्म दे जीवों को माँ का गौरव पाया है,
उठा बोझ जीवों का,माँ का कर्तव्य निभाया है।
करने तृप्त क्षुधा जीवों की मैंने अन्न उगाया है
मेरे सीने में घाव कर,खनिज भंडार पाया है।अपना स्वार्थ सिद्ध करने को आधार मुझे बनया है।
अभी वक्त है,कर संरक्षण पर्यावरण का सावधान जो हो जाएगा,
ले शपथ जल संरक्षण, वायु संरक्षण,प्रदूषण खुद मिटाएगा,
घाव भर मेरे ह्र्दयके अपना कर्तव्य निभायेगा,
युगों युगों तक संचित फिर सम्पदा मेरी पायेगा।
मैं माँ तू मेरा लाल कहायेगा ।।
गीतांजली वार्ष्णेय

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