ज़िला हिसार, हरियाणा
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ग़ज़ल
मोहब्बत को माना है गर बन्दगी
अँधेरों में मिल जाएगी रोशनी
तुम्हे पा लिया और क्या चाहिए
तुम्ही पहली ख़्वाहिश थी तुम आख़िरी
अजब मसअला है किसी क़तरे से
समन्दर बुझाता है गर तिश्नगी
हुआ क्या ग़मों से ज़रा सामना
बहाने लगे आँसुओं की नदी
कभी दोस्तो को किया है खफ़ा
कभी दुश्मनो से है की दोस्ती

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