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शीर्षक-----जहाजों की भीड़
जनाजों की भीड़ जैसे कुछ बता रही है.
मरने के बाद उसकी कीमत बता रही है..
जीते जी रिश्तों की भीड़ अकेला वो था.
मरने के बाद रिश्तेदारी निभाई जारही है..
नफरत इतनी जीते जी जीना मुहाल था.
मरते ही कितनी मोहब्बते निभाई जा रही है..
काश सीख लेते जीते जी जीने का अंदाज.
कहानी अब तुम्हारी इतिहास बनती जा रही है..
जीते जी तरसते रहे मीठे दो बोलों के लिए.
मरने पे मालपुऐ और मिठाई खिलाई जा रही है..
वाह रे मानव जीवन क्या तेरी व्यथा विषम है.
सांस चुकते ही कर्ज चुकाने की बात की जा रही है..
काश जीते जी अनंत की यात्रा तुम कर पाते.
अब अनंत भव भ्रमण की तैयारी की जा रही है..
काश कुछ रिश्ते बनते ही टूट जाया करते.
क्यों....गैरों द्वारा रिश्तेदारी निभाई जा रही है

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