राज्य-कर्नाटक
कविता का शीर्षक- मुक्त
8867417505
मुक्त
हे मेरे परमपिता
मुझे मुक्त कर दे
इन जंजीरों से
मुझे मुक्त कर दे
मेरी मंजिल कहाँ है
ये मैं नहीं जानता
मेरा यान कहाँ जा रहा है
ये मैं नहीं जानता ।
इन बंधनों में जकड गया
स्थिति ऐसी बन गई है
साँस नहीं ले पा रहा हूँ
हरदम घुटन सी होती है
दिल को पत्थर बना लेता हूँ
चल तू मुझे मुक्त कर दे
अब मेरे आत्मा को
परमात्मा में लीन कर दे ।
सहता हूँ सबकुछ चुपचाप
रोता हूँ मन में चुपचाप
चला आता हूँ तेरी ओर चुपचाप
तू मुझे मुक्त कर दे चुपचाप ।
व्याख्याः- कल हमारे एक परिचित ने आत्महत्या कर ली उसी संदर्भ में लिखी हुई कविता है। इसे नकारात्मक भाव से न लें।
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