पता - पेंडरवानी , बालोद , छ. ग.
शीर्षक - बाबा साहेब अम्बेडकर
विधा - गेय काव्य
बाबा साहेब अंबेडकर
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अंधविश्वासों पर प्रहार करते ,
रहे कभी न डरकर ,
जन-जन को अभिमान दिलाये ,
बाबा साहेब अंबेडकर ,
1 छुआछूत था हावी समाज पर ,
मानव , मानव न समझे जाते थे ,
प्रारब्ध समझकर अवर्ण सभी ,
सहते थे ,पछताते थे ,
14 अप्रैल को ईश्वर हो आया ,
मानो धरा उतरकर
जन-जन को .....
2 भरी बावड़ी ,छलके नदियां फिर भी ,
बूँद -बूँद को तरसते थे ,
भेदभाव से घिरे समाज में ,
आँसू - नीर बरसते थे ,
ऐसे पल- पल यातनाओं को ,
जवाब दिए वे डटकर
जन -जन का ....
3 झिड़की सुनना , मैला ढोना ,
न जाने क्या -क्या अपमान थे ,
कई तरह के यातना सहते ,
मानो मनरंजन के सामान थे ,
बहुजनों के दुख को दूर भगाया ,
वे उनका हक देकर ,
जन -जन को ..
4 जाति - पाति से बटे देश में ,
निम्नो को क्या - क्या न सहना पड़ा ,
दोष युक्त खुद कुलीन फिर भी ,
दोषी बनकर रहना पड़ा ,
ऐसे में सम्मान की रक्षा करने ,
आएं वो अकड़कर ,
जन -जन को ...
5 स्वतंत्र भारत को संविधान दियें ,
जीने का सम्मान दिए ,
अधिकार बना हर जन -जन का ,
उनको उनका स्वाभिमान दिए
हे युगपुरुष तुम धन्य हो ,
सब दिए हमें खुद सहकर ,
जन-जन को ...
6 आजादी के बाद अब भी ,
समाज बटे -बटे है क्यूं ?
ज्ञान, विवेक अम्बार लगा है ,
फिर भी कटे - कटे है क्यूं ?
हम इंसां है , देश एक है ,
रहो न यूं फिर बटकर ,
जन - जन को ....
- शैलेन्द्र कुमार चेलक -
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