Wednesday, April 15, 2020

छत्तीसगढ़ से शैलेन्द्र चेलक की रचना- बाबा साहब

नाम - शैलेन्द्र  चेलक 
पता - पेंडरवानी , बालोद , छ. ग.
शीर्षक - बाबा साहेब अम्बेडकर
 विधा - गेय काव्य 

      बाबा साहेब अंबेडकर
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  अंधविश्वासों पर प्रहार करते ,
  रहे कभी न डरकर ,
  जन-जन को अभिमान दिलाये ,
  बाबा साहेब अंबेडकर ,
1 छुआछूत था हावी समाज पर ,
  मानव , मानव न समझे जाते थे ,
  प्रारब्ध समझकर अवर्ण सभी ,
  सहते थे ,पछताते थे ,
  14 अप्रैल को ईश्वर हो आया ,
  मानो धरा उतरकर
  जन-जन को .....
2  भरी बावड़ी ,छलके नदियां फिर भी ,
  बूँद -बूँद को तरसते थे ,
  भेदभाव से घिरे समाज में ,
  आँसू - नीर बरसते थे ,
  ऐसे पल- पल यातनाओं को ,
  जवाब दिए वे डटकर 
  जन -जन का ....
3   झिड़की सुनना , मैला ढोना ,
   न जाने क्या -क्या अपमान थे ,
  कई तरह के यातना सहते ,
  मानो मनरंजन के सामान थे ,
  बहुजनों के दुख को दूर भगाया ,
  वे उनका हक देकर ,
  जन -जन को ..
4  जाति - पाति से बटे देश में ,
  निम्नो को क्या - क्या न सहना पड़ा ,
  दोष युक्त खुद कुलीन फिर भी ,
  दोषी बनकर रहना पड़ा ,
  ऐसे में सम्मान की रक्षा करने ,
  आएं वो अकड़कर ,
  जन -जन को ...
5 स्वतंत्र भारत को संविधान दियें ,
   जीने का सम्मान दिए ,
  अधिकार बना हर जन -जन का ,
  उनको उनका स्वाभिमान दिए
  हे युगपुरुष तुम धन्य हो ,
  सब दिए हमें खुद सहकर ,
  जन-जन को ...
6 आजादी के बाद अब भी ,
  समाज बटे -बटे है क्यूं ?
  ज्ञान, विवेक अम्बार लगा है ,
  फिर भी कटे - कटे है क्यूं ?
  हम इंसां है , देश एक है  ,
  रहो न यूं फिर बटकर ,
  जन - जन को ....

       -  शैलेन्द्र कुमार चेलक  -

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