राज्य - छत्तीसगढ़
कविता का शीर्षक - नारी शक्ति
कविता -------------
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नारी शक्ति
नारी तू सृष्टि सृजनहार है तेरी अस्तित्व यहाँ बरकरार है
वरना कहाँ धरा में फलता फूलता अनुराग स्नेह दुलार है ।
आँचल में संचित तेरी दया करुणा तू ही ममता की सागर है
तू पूजनीय वंदनीय है नारी अस्मिता की जीवंत साक्षात्कार है ।
विनम्र विनती शांति शकुन शालीनता सहनशीलता की सार है
वेदों पुराणों धर्म ग्रंथो में तेरी गाथा महिमा की जय जयकार है ।
ऐसी निर्वहन भूमिका है तेरी सम्पूर्ण मानव जाति कर्जदार है
रिश्तों में सुखद भाव निवेशित इठलाती चंचल नदी की धार है ।
तेरी मर्यादा को जब लांघ जाए कोई तब तू जलती अंगार है
सभ्य समाज की निर्माता तू नव दिशा नव चेतन नवाचार है ।
ज्ञान की नव ज्योतिर पुंज तुम बिन आभा रहित अंधकार है
तेरी लज्जा मासूम मुस्कान चिरंतन आभूषण और सिंगार है ।
सुकोमल सुमधुर शीतल स्वर कोकिल सा कंठ रसदार है
सौम्य शुशील सुसंस्कृत तेज स्वभाव सुंदर आचार विचार है ।
दुःसाहस की नारी सत्ता को जीतने की तो सुनिश्चित ही हार है
तपस्विनी सती सावित्री पवित्र वैदेही भव में लीला अपरंपार है ।
संज्ञा न रही अबला की अब अदित्य कृतिमान के समाचार है
मां पत्नी बेटी बहन बहु का जाने कितना जीवन मे उपकार है ।
भोग वासना की वस्तु नही ये ईश्वर की सर्वोत्तम उपहार है
बद नियत न आजमाएं इनकी आबरू पर ये पाप अनाचार है ।
दुर्गा लक्ष्मी कल्पना ने जग में किया अलौकिक चमत्कार है
समस्त नारी शक्ति को मेरा सह्रदय से सत सत नमस्कार है ।

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