राज्य-उत्तराखंड
शीर्षक-मजदूर पथिक
आज मैंने मजबूरन
उसको पत्थर तोड़ते देखा है।।
राह के चंद डगर पार
उसको सरिया मोड़ते देखा है।।
कुछ चरक चूं या मजबूरी थी।
अदा उसकी उलझी या अधूरी थी।
फिर भी मैंने उसको दिन भर कठिन
काम करते देखा है।।
दो वक्त की रोटी जुटाकर शाम
को मुदित घर लौटते देखा है।।
सूर्य उग आने से पहले पहुंचा
पहला पथिक देखा है।
चंद्र व्याप्त फैलने के बाद
घर लौटते देखा है।।
कड़कती ठंड देह प्रकृति मैं
भी हात चलाते देखा है।।
भीषण लू ज्येठ की विषम मैं
भी पसीने से नहाते देखा है।।
बच्चो की रोदनता और पत्नी की घुटन
पर उसे रोते देखा है।।
सुनशान मद राग गान मैं
भी उसे बाट जोतते देखा है।।
दीपक मैठाणी

THanku so much for publish my poem
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