शीर्षक-कुदरत का न्याय
राज्य-प्रयागराज, उत्तरप्रदेश
कुदरत का ये कैसा न्याय हो रहा है,
इंसान इंसान से डर के जी रहा है.....
जीव जंतु,पशु पक्षियों तक,
पेड़ों को काटा, नदियों को बांटा...
हर किसी को इंसानों ने,
अचार समझ कर चाटा..
धरती का सीना चिथड़ा करके इंसानों ने,
अपने अज्ञानता और अहंकार से पाट रहा है...
कुदरत का ये कैसा न्याय हो रहा है,
इंसान इंसान से डर के जी रहा है.....
छेड़छाड़ कर प्रकृति को ,
हम सब ने सामंजस्य को बर्बाद किया है,
खुद को सर्वश्रेष्ठ समझ कर,
हर जीव का संहार किया है,
ऐसे नहीं माँ के कलेजे से आह आती है,
एक बच्चा दूसरे बच्चे के साथ उत्पात मचा रहा है...
कुदरत का ये कैसा न्याय हो रहा है,
इंसान इंसान से डर के जी रहा है....
मर्म अब बाजारों में बिकने लगा है,
संवेदना अब महलों की चोटियों पर चढ़ने लगा है....
मानवता की ताक पर इंसान अब बिक कर,
जाति धर्म के नाम पर कत्लेआम कर रहा है....,
अधर्म जब हद से बढ़ा ,
तो प्रकृति का कहर बरप रहा है....
कुदरत का ये कैसा न्याय हो रहा है,
इंसान इंसान से डर के जी रहा है.....
कभी प्लेग कभी सुनामी,
भूकम्प उल्का पिंड डरा रहे थे....
सम्भल जा रे मानव ,
ये रह रह बता रहे थे....
जब न समझे जब न सम्भले
तो #कोरोना ने जाल फैलाया है,
रो रो कर सब जी रहे हैं पूरा विश्व अब,
फिर भी कुदरत को न कोई रहम आया...
कुदरत का ये कैसा न्याय हो रहा है,
इंसान इंसान से डर के जी रहा है...
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