राज्य- रीवा, मध्यप्रदेश
शीर्षक-
द्रोपदी की लाज
काश! इंसान-इंसान की तरह जी सकता
फटी वेदना की चादर को दर्जी सी सकता!!
ना लुटती कहीं भी किसी द्रोपदी की लाज
सुन सकते दीन,हीन,दुखियों की आवाज!!
थम जाये रहजनी,डकैती,हत्याओं का दौर
कोई निर्बल ना बने किसी सबल का कौर!!
गरीबी,भुखमरी,ना रहे कुपोषण का साया
लोकतंत्र को लूट सके ना कुबेर की माया!!
लौट सकें फिर सुकून के दिन जो बीत गये हैं
फिर बरसें वो बादल जो बरस के रीत गये हैं!!
आशीष तिवारी निर्मल
बहुत बहुत आभार सर जी
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