राज्य - ३६ - गढ़
शीर्षक :-- होली का बदलता स्वरूप
गिरगिट भी रंग बदलने से डरने लगे हैं
अब तो होली के रंग भी फीके लगने लगे हैं ।
नगाड़ों के थाप की आवाज सुनाई नहीं देते
अब तो होलिका भी खुद से जलने लगे हैं ।
युवकों की टोली कहीं दिखाई नहीं देते
नशे की गिरफ्त में सब ढलने लगे हैं ।
फाग के गीत भी जाने खो से गए हैं
डी जे के गीत अब तो हर जगह बजने लगे हैं ।
लोगों में उमंग उत्साह अब दिखाई नहीं देता
होली के डर से सब घर में दुबकने लगे हैं ।
एस के नीरज
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