शीर्षक- आईना
राज्य-छत्तीसगढ़
बचपन में अकसर छोटे से
आईने में देखा करते थे
अपना ही मुस्कुराता चेहरा
उन्मुक्त बचपन, तितलियों
और पक्षियों की उड़ान।
अपनी सखी की आंखों को
आईना बना संवार लेती थी
अपने बिखरे उड़ते बाल,
टूटे सीसे का टुकड़ा भी था
बहुत बेशकीमती दौलत।।
अब बड़े आईने में ढूंढ़ती हूं
सुकून, बचपन के वो पल,
जाने कब सूख गया फूर्सद
का वो समंदर, बेफिक्री के
वो मस्ती भरे अच्छे दिन।।
यादों के स्टेशन पर उतर कर
ढूंढती हूं बचपन का वही
आईना और लबों पर आने
को तरसती है वो तबस्सुम।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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