*लौट आओ*
कितना आतुर हैं ह्रदय मेरा
बेइंतहा मुहब्बत हैं तुमसे ।
यू तोड़ कर मत जाओ
कितनी हसरतें सजी हैं तुमसे ।
क्षण क्षण निगाहे ढूंढती हैं
हर लम्हे पुकारते हैं तुझे ।
सिसकती सासों की सिसकियां
हर पल बुला रही हैं तुझे ।
जाने तुम क्यो रूठ गये हो
सोचो क्या बीतेगी दिल पर ।
किस खता की मिली सज़ा
छोड़ चले तुम गैर समझकर ।
पूछो इस धड़कन से जो
गीत तेरा ही गुनगुना रही हैं ।
ये वृक्ष, ये लता, ये पगली पवन,
ये सब तुम बिन कुछ नहीं ।
तेरे बिन न सांझ होती हैं
न होता हैं तुम बिन सवेरा
छेड़ जाती हैं ये निशा भी
जब तन्हाई डालती डेरा ।
तरस जाता हैं ये दिल भी
मरुस्थल में बून्द की तरह ।
टूट कर बिखर जाता हैं ये
ह्रदय भी शीशे की तरह ।
लौट आओ साजन मेरे
तुम सागर, मैं साहिल हूँ
लगे सब कुछ अधूरा बिन तेरे
तूम चांद, मैं चांदनी हूँ ।।
✍ एल आर सेजु थोब 'प्रिंस'
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