शीर्षक-विवाह
राज्य-छत्तीसगढ़
*विवाह* एक पवित्र बंधन
जिसकी डोर का छोर नहीं।
बंधकर जिसमें एक कन्या
भूल जाती अल्हड़पन।
जिम्मेदारी का बीड़ा उठाने
परेशानियों के थपेड़े सह
सर्वस्व न्यौछावर कर
बनाती है घरौंदा
गूंथती है भाईचारे की रोटी
आधी रोटी खाकर भी
गढ़ती है कलाम और
किरण बेदी।
पति सींच अपने पसीने
की बूंदें
,उफ तक नहीं करता।
झंझावातों की तपिश से
अपने घरौंदे को बचाता।
एक और एक ग्यारह होकर
अपने आंगन को बनाते हैं
*क्षितिज*
एक नये सूरज के लिए।
नये आसमान के लिए।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर
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